नई दिल्ली: PRS Legislative Research की एक रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल विधानसभा ने 2021 से 2026 के बीच कुल 166 दिनों तक बैठक की और लगभग 430 घंटे कामकाज किया। इस अवधि में सदन का औसत वार्षिक कार्यकाल करीब 33 दिन रहा।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 91 प्रतिशत विधेयक (बिल) एक ही दिन में पेश कर पारित कर दिए गए, जबकि 2011 के बाद से किसी भी विधेयक को जांच के लिए समिति के पास नहीं भेजा गया। सामान्यतः विधानसभा के सत्र हर वर्ष अलग-अलग होते हैं, लेकिन 17वीं विधानसभा के दौरान 2023 में शुरू हुआ सत्र औपचारिक रूप से समाप्त नहीं किया गया और 2026 तक जारी रहा।
सत्र के समाप्त न होने के कारण लंबित कार्य—जैसे विधेयक, प्रस्ताव और नोटिस—जारी रहे और नए सत्र के लिए राज्यपाल की ओर से अलग से समन की आवश्यकता नहीं पड़ी। इसी वजह से 2024 में राज्यपाल का पारंपरिक संबोधन नहीं हुआ, हालांकि 2025 और 2026 में यह संबोधन दिया गया।
इस दौरान कुल 74 विधेयक पेश किए गए। इनमें महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों पर सख्त दंड का प्रावधान करने वाला ‘अपराजिता’ विधेयक, जाति प्रमाण पत्र से जुड़े मामलों के लिए अपील तंत्र स्थापित करने वाला संशोधन विधेयक, और निजी स्वास्थ्य संस्थानों के नियमन को मजबूत करने वाला विधेयक शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 17वीं विधानसभा में पारित 62 प्रतिशत विधेयकों को तीन महीने के भीतर राज्यपाल की स्वीकृति मिल गई, जबकि कुछ विधेयकों को मंजूरी मिलने में एक वर्ष से अधिक समय लगा। इनमें विश्वविद्यालयों और प्रशासनिक शक्तियों से जुड़े संशोधन प्रमुख रहे।
वित्तीय मामलों पर चर्चा औसतन छह दिनों तक चली, जो राज्य के बजट पर विचार-विमर्श की अवधि को दर्शाती है।