नई दिल्लीः I-PAC मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की याचिका और उसके संवैधानिक अधिकार क्षेत्र को लेकर गहन बहस देखने को मिली। अदालत में वकीलों ने यह सवाल उठाया कि क्या कोई केंद्रीय जांच एजेंसी संविधान के मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सकती है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि ED के पास इस तरह की याचिका दाखिल करने का कोई “मौलिक अधिकार” नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 नागरिकों के लिए बनाए गए हैं, न कि किसी जांच एजेंसी के लिए। उनके अनुसार, कोई भी अधिकारी अपने विभागीय अधिकारों से आगे जाकर अप्रत्यक्ष रूप से वह काम नहीं कर सकता जो उसे सीधे तौर पर प्राप्त नहीं है।
सिंघवी ने यह भी कहा कि ED एक शक्तिशाली एजेंसी है, लेकिन उसकी शक्तियां अधिकार नहीं बन सकतीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि विभागीय क्षमता के नाम पर संवैधानिक अधिकारों का विस्तार नहीं किया जा सकता।
राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने भी ED की याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए। उन्होंने संविधान सभा की 1948 की बहसों का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 32 केवल नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, न कि राज्य या उसकी एजेंसियों के उपयोग के लिए।
उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र और राज्य के बीच विवाद की स्थिति में अनुच्छेद 131 लागू होता है, न कि अनुच्छेद 32। अपने तर्क में उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विकसित उस संवैधानिक सोच का भी उल्लेख किया, जिसमें नागरिक अधिकारों को राज्य की शक्ति से सुरक्षा देने की व्यवस्था की गई थी।
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि जब मामला उनके पक्ष में नहीं जा रहा होता है, तभी इसे तकनीकी आधार पर खारिज करने की कोशिश की जाती है।सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी राज्य का मुख्यमंत्री इस तरह जांच प्रक्रिया में सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता, क्योंकि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
इस पूरे मामले ने अदालत में संविधान, मौलिक अधिकारों और जांच एजेंसियों की शक्तियों की सीमाओं पर एक व्यापक और महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया।