मॉर्डन जमाने के साथ कदमताल मिलाते हुए लोग आगे तो बढ़ते हैं लेकिन रिश्तों को जोड़ने के बजाए उनके बीच विलेन बन जाता है स्मार्ट फोन। दिनभर के काम से हुई थकान के बाद पति-पत्नी या फिर पार्टनर्स एक ही कमरे में और एक ही बिस्तर पर लेटे हैं।
शायद दोनों अपनी जुबान से तो कह रहे हैं कि मैं तुमसे प्यार करता/करती हूं। लेकिन उनका पूरा ध्यान मोबाइल पर टिका हुआ है। हाथों की उंगलियां लगातार स्क्रीन पर स्क्रॉल किए जा रही हैं।
बेडरूम में भी मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल करने की वजह से यह लोगों के सेक्स लाइफ को भी प्रभावित करता है। लोग एक-दूसरे के पास होकर भी उनके बीच मानसिक दूरी बढ़ती जाती है।
मौजूद होकर भी हैं गैरमौजूद
अपने पार्टनर के साथ मौजूद होकर आपकी मौजूदगी की गर्माहट उन्हें महसूस नहीं होती। बेडरूम में मोबाइल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल का मतलब है कि वह आपका बेडरूम नहीं बल्कि ड्राईंग रूम ही बन गया है। ऑफिस के ईमेल, दोस्तों के साथ चैट या सोशल मीडिया नोटिफिकेशन - हर कोई अपनी वर्चुअल दुनिया में व्यस्त है।
इस वजह से एक ही बिस्तर पर साथ लेटे होने के बावजूद पार्टनर्स के बीच मानसिक दूरी बढ़ने लगती है। वे एक-दूसरे की उपस्थिति को महसूस ही नहीं कर पाते। मन लगातार मोबाइल में ही उलझा पड़ा रहता है।
खाली समय भी है बेहद जरूरी
रिश्तों में गर्माहट बनाए रखने के लिए कुछ ‘खाली समय’ या शांत क्षणों का होना बहुत आवश्यक होता है। कुछ ऐसे पल जब कोई बात न कर रहा हो। बस एक दूसरे के साथ और एक-दूसरी की उपस्थिति को महसूस किया जा रहा हो। लेकिन मोबाइल अब उस खाली समय को भी धीरे-धीरे निगलता जा रहा है। जब हर पल स्क्रीन से भर जाता है तो रिश्तों में भावनात्मक और यौन इच्छाओं के विकसित होने की कोई जगह ही नहीं बचती।
बेडरूम का साथी बन रहा मोबाइल Image : AI
मोबाइल एक लत की तरह होती है। सोशल मीडिया पर मिलने वाला एक लाइक या एक मैसेज हमें तुरंत खुशी दे देता है। इसे ‘इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन’ कहा जाता है। लेकिन पार्टनर के साथ बिताया हुए पल जीवन या स्वस्थ रिश्तों का समीकरण ही अलग बनाता है। स्क्रीन की इस दौड़ में वही जादू धीरे-धीरे अब गायब होता जा रहा है।
क्या है इससे बचने के उपाय?
डिजिटल दुनिया से पूरी तरह सन्यास लेने की जरूरत नहीं है लेकिन कुछ नियम तो बनाए ही जा सकते हैं।
नो-फोन ज़ोन : बेडरूम या बिस्तर पर मोबाइल नहीं होना चाहिए। स्मार्टफोन को बिस्तर से दूर, साइलेंट मोड में रखना चाहिए। इसके अलावा डिजिटल डिटॉक्स हमेशा रिश्तों को बेहतर बनाने में मदद करता है।
एक-दूसरे की सुने और एक्सपेरिमेंट करें : अगर एक पार्टनर रात के समय वाले रुटिन में कुछ बदलाव चाहता है और दूसरा मोबाइल छोड़ने को तैयार नहीं है, तो सिर्फ तकनीकी नियम लागू करने से फायदा नहीं होगा। दोनों को आपस में बात करनी चाहिए। सप्ताह में कम से कम एक रात ‘नो-फोन नाइट’ के रूप में बिताकर देखें। फर्क खुद महसूस होगा।