नई दिल्लीः केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा है कि ब्रिटिशकालीन जिला कलेक्टरेट, न्यायालय, अस्पताल भवन, रेलवे स्टेशन और अन्य सार्वजनिक संरचनाओं का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने राज्यों से इस दिशा में “अधिक गंभीरता” के साथ काम करने की अपील की है।
यह टिप्पणी उन्होंने एक विशेष साक्षात्कार में की, जिसमें उन्होंने देशभर में कई ऐतिहासिक भवनों के वर्षों से उपेक्षित रहने या ध्वस्त किए जाने के मामलों पर चिंता व्यक्त की।
राज्यों और एएसआई की जिम्मेदारी पर स्पष्टता
गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधीन राष्ट्रीय महत्व के 3,686 स्थल संरक्षित हैं। इसके अलावा प्रत्येक राज्य के अपने पुरातत्व विभाग हैं, जो राज्य-स्तरीय संरक्षित स्मारकों की देखभाल के लिए जिम्मेदार हैं।
उन्होंने कहा कि राज्यों में कई किले, महल और ब्रिटिशकालीन भवन पहले से संरक्षित सूची में शामिल हैं और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों की है। यह कार्य उपलब्ध संसाधनों के आधार पर किया जाता है।
‘100 साल से पुराने ढांचे भी अब विरासत’ - शेखावत
मंत्री ने कहा कि स्वतंत्रता के 75 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और सामान्य रूप से 100 वर्ष से अधिक पुराने ढांचों को विरासत माना जाता है। उन्होंने कहा कि आजादी के समय कई संरचनाएं 20 से 40 वर्ष पुरानी थीं, इसलिए वे उस समय विरासत श्रेणी में शामिल नहीं हो सकीं। लेकिन अब समय के साथ ब्रिटिशकालीन इमारतें भी संरक्षित करने योग्य धरोहर बन चुकी हैं।
उन्होंने कहा कि जिला कलेक्टरेट, अदालतें, अस्पताल और पुराने रेलवे स्टेशन जैसे ढांचे, जो 100 से 125 वर्ष पुराने हो सकते हैं, उन्हें संरक्षण की आवश्यकता है।
संरक्षण में राज्यों की भूमिका पर जोर
गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि देश के लगभग सभी रियासतों और औपनिवेशिक काल के दौरान बने कई ढांचे आज भी मौजूद हैं। कुछ राज्यों और निजी संस्थाओं द्वारा इनके संरक्षण और पुनः उपयोग की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि समय की मांग है कि राज्य सरकारें इस दिशा में अधिक गंभीरता से कदम उठाएं, ताकि ऐतिहासिक धरोहरें नष्ट होने से बच सकें।
विरासत और विकास के बीच संतुलन की चुनौती
भारत में प्राचीन मंदिरों से लेकर मध्यकालीन किलों और औपनिवेशिक कालीन भवनों तक विविध ऐतिहासिक संरचनाएं मौजूद हैं। कई ब्रिटिशकालीन भवन आज भी सरकारी कार्यालयों, संग्रहालयों, पुस्तकालयों और रेलवे स्टेशनों के रूप में उपयोग में हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, कई भवनों को संरक्षित सूची में शामिल न किए जाने के कारण वे उपेक्षा या ध्वस्तीकरण के खतरे में रहते हैं।
कई राज्यों में सफल पुनः उपयोग के उदाहरण
राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों ने कई ब्रिटिशकालीन हवेलियों, बंगलों, महलों और किलों को हेरिटेज होटल और होमस्टे के रूप में विकसित किया है। इससे न केवल संरचनाओं का संरक्षण हुआ है, बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा मिला है।
पहले की घटनाएं और संरक्षण की चुनौतियां
वर्ष 2022 में पटना कलेक्टरेट परिसर, जिसमें डच और ब्रिटिश काल की संरचनाएं शामिल थीं, को ध्वस्त कर दिया गया था, जिसका कई विरासत प्रेमियों और विशेषज्ञों ने विरोध किया था।
इससे पहले वर्ष 2016 में नीदरलैंड के तत्कालीन राजदूत ने भी इसे संरक्षित रखने की अपील की थी, इसे भारत और नीदरलैंड की साझा विरासत बताया गया था। मंत्री ने कहा कि ऐतिहासिक इमारतें केवल पुरानी संरचनाएं नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। ऐसे में राज्यों को चाहिए कि वे विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए इन धरोहरों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाएं।