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एवरेस्ट पर मौत के बाद शुरू होती है जंग! शव उतारना क्यों है करोड़ों का मिशन? जानिए रेस्क्यू की चुनौतियां!

हिलेरी स्टेप से मृतक के शव को नीचे उतारने का खर्च करीब भारतीय मुद्रा में लगभग ₹1.1 करोड़ बतायी जाती है। साथ ही इन शवों को पहाड़ों की ऊंचाई से नीचे लाना बेहद चुनौतीपूर्ण भी है।

By Moumita Bhattacharya

May 29, 2026 17:42 IST

एवरेस्ट के Death Zone में अक्सर चढ़ाई अभियान के दौरान मरने वाले पर्वतारोहियों के शव पड़े होने की खबरें सामने आती रहती हैं। क्या आप जानते हैं एवरेस्ट की चोटी छूने से भी अधिक खर्चीला उन पर्वतारोहियों के शवों को नीचे उतारना होता है जिनकी किसी कारणवश चढ़ाई अभियान के दौरान मौत हो जाती है! सिर्फ इतना ही नहीं, इन शवों को पहाड़ों की ऊंचाई से नीचे लाना बेहद चुनौतीपूर्ण भी माना जाता है। पर क्यों?

हाल ही में तेलंगाना के एक पर्वतारोही की मौत एवरेस्ट की चोटी से नीचे उतरते समय हिलेरी स्टेप पर हो गयी। इसके बाद परिवार ने फैसला लिया कि उनके शव को पर्वत पर ही छोड़ दिया जाए।

NDTV की मीडिया रिपोर्ट की मानें तो हिलेरी स्टेप से मृतक के शव को नीचे उतारने का खर्च करीब $114,000 यानी भारतीय मुद्रा में लगभग ₹1.1 करोड़ बतायी जाती है। माना जा रहा है कि यह भी एक वजह हो सकती है जिसके कारण हैदराबाद के पर्वतारोही के परिजनों ने शव को नीचे न लाने का फैसला लिया होगा। पर क्यों होता है इतना खर्च? और एक शव को एवरेस्ट की चोटी से नीचे उतारने में कौन-कौन सी मुश्किलें आती होंगी?

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हिलेरी स्टेप कहलाता है Death Zone

माउंट एवरेस्ट के सबसे मुश्किल भरे हिस्सों में एक हिलेरी स्टेप (Hillary Step) होता है। यह जगह पूरी तरह से पथरीला और एवरेस्ट की चोटी के बेहद करीब होता है। इस वजह से यहां सांस लेना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसकी शुरुआत लगभग 26000 फीट की ऊंचाई से होती है।

यह जगह बेहद खतरनाक होता है जिस वजह से इसे Death Zone भी कहा जाता है क्योंकि माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई पूरी कर उतरते समय बड़ी संख्या में पर्वतारोहियों की मौत यहीं पर हुई है। BBC की मीडिया रिपोर्ट के हवाले से बताया जाता है कि अब तक करीब 200 पर्वातरोहियों के शव Death Zone में पड़े हुए हैं जिन्हें नीचे नहीं उतारा गया।

कुछ के शवों को उनकी आखिरी इच्छा को पूरी करने के लिए छोड़ दिया गया तो कुछ को नीचे उतारने में आने वाली चुनौतियों और भारी खर्च की वजह से उतारना संभव नहीं हो सका। चूंकि Death Zone में साल भर भारी मात्रा में बर्फ जमी रहती है इसलिए बर्फ के अंदर धंसे रहने की वजह से सालों साल शवों को कोई नुकसान नहीं होता और वे ज्यों कि त्यों बनी रहती है।

माउंट एवरेस्ट का डेथ ज़ोन हिलेरी स्टेप Image : X

शवों को नीचे लाने में क्यों होता है इतना खर्च?

मीडिया रिपोर्ट में कुछ कारण बताएं गए हैं, जिनकी वजह से माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई के दौरान मरने वाले पर्वतारोहियों को शवों को नीचे लाना बेहद खर्चीला हो जाता है -

  1. अत्यधिक वजन : किसी सामान्य व्यक्ति का वजन अगर 80 किलोग्राम होता है तो शवों के फुल जाने की वजह से उनका वजन करीब दोगुना यानी 150 किलोग्राम तक हो जाता है। इस वजह से शवों को पहाड़ से नीचे लाने के लिए कम से कम 6 से 10 शेरपा की जरूरत हो सकती है।
  2. शव को सुरक्षित उतारना चुनौतिपूर्ण : शव को नीचे लाने या अपनी जगह से हिलाने-डुलाने के लिए उसे किसी मजबूत कपड़े में लपेटना पड़ेगा। फिर रस्सी से बांध कर उसे सुरक्षित करना पड़ेगा ताकि बीच रास्ते में कहीं किसी और खाई में न गिर जाए। इतना सब कुछ करने के लिए Death Zone पर आवश्यक जगह की अनुपलब्धता इसे और भी चुनौतीपूर्ण बना देता है।
  3. एवरेस्ट की चढ़ाई के दौरान हवा की कमी होने की वजह से कैम्प 2 से पहले हेलीकॉप्टर कहीं भी लैंड नहीं कर पाता है जो करीब 21000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। वहां हेलीकॉप्टर के लैंड करने से लैंडस्लाइड अथवा एवालांच का खतरा भी बढ़ जाता है।

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हैदराबाद के पर्वतारोही के परिवार का तर्क था कि एवरेस्ट पर महादेव के चरणों में ही पर्वतारोही अरुण कुमार तिवारी (53) का शव छोड़ दिया जाए। साथ ही परिवार का कहना है कि उनके शव को नीचे लाना भी अपने-आप में एक जोखिम भरा काम है और इस दौरान शव को नुकसान भी पहुंच सकता है। इस वजह से भी शव को एवरेस्ट पर ही छोड़ने का फैसला लिया गया है।

बढ़ रही है एवरेस्ट पर भीड़

News 18 की मीडिया रिपोर्ट की मानें तो एवरेस्ट पर लगातार चढ़ाई करने वालों भीड़ बढ़ रही है। इस साल यानी 2026 में नेपाल के पर्यटन विभाग ने 494 विदेशी पर्वतारोहियों को परमिट जारी किया था जो अब तक का सर्वाधिक है।

हर परमिट की कीमत 15,000 डॉलर यानी तकरीबन 12 से 13 लाख भारतीय रुपये होती है। दावा किया जा रहा है कि 20 मई 2026 को एक ही दिन में 274 पर्वतारोही एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचे थे। इस वजह से डेथ ज़ोन में ऑक्सीजन के खत्म होने और पर्वतारोहियों की मौत होने का खतरा भी बढ़ गया था।

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