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कैंसर के दर्द ने बदल दी सोच, किसान ने जैविक खेती से हासिल की राष्ट्रीय पहचान

रासायनिक खाद छोड़ प्राकृतिक खेती अपनाने वाले सूरत के किसान कल्पेश पटेल अब 50 से ज्यादा किस्मों के केले उगाकर कमा रहे लाखों रुपये।

By श्वेता सिंह

May 26, 2026 19:17 IST

सूरतः गुजरात के सूरत जिले के ओलपाड तालुका के सरस गांव में रहने वाले युवा किसान कल्पेश पटेल की कहानी आज प्राकृतिक खेती की एक बड़ी मिसाल बन चुकी है। कभी उनके खेतों में रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों का इस्तेमाल होता था, लेकिन पिता की कैंसर से मौत ने उनकी जिंदगी और खेती दोनों की दिशा बदल दी। अब वही किसान प्राकृतिक खेती के जरिए न सिर्फ बेहतर उत्पादन ले रहे हैं, बल्कि दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा भी बन गए हैं।

पिता की बीमारी ने बदल दी जिंदगी

कल्पेश पटेल एक निजी कंपनी में केमिकल ऑपरेटर के तौर पर काम करते हैं। उनके पिता रमणभाई पारंपरिक तरीके से खेती करते थे और खेतों में बड़े पैमाने पर रासायनिक खाद व कीटनाशकों का उपयोग होता था। कल्पेश बताते हैं कि खेतों से लौटने के बाद पिता के शरीर और कपड़ों से कीटनाशकों की तेज गंध आती थी। उस समय वे खेती से सीधे जुड़े नहीं थे, इसलिए ज्यादा हस्तक्षेप भी नहीं करते थे।

लेकिन जब उनके पिता कैंसर की चपेट में आए और बाद में उनकी मौत हो गई, तब कल्पेश को गहरा झटका लगा। उन्होंने महसूस किया कि खेती में इस्तेमाल होने वाले रसायन इंसानों और जमीन दोनों के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। यहीं से उन्होंने प्राकृतिक खेती अपनाने का फैसला किया।

2019 से शुरू की प्राकृतिक खेती

साल 2019 में कल्पेश ने पूरी तरह प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने गुजरात सरकार के कृषि विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और जैविक तरीकों से खेती करना सीखा। इस दौरान उन्होंने जीवामृत जैसे प्राकृतिक खाद तैयार करने की तकनीक सीखी और खेतों में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग बंद कर दिया।

धीरे-धीरे उन्होंने अपने खेतों में ‘फॉरेस्ट मॉडल’ खेती भी शुरू की, जिसमें प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हुए खेती की जाती है। इसका असर मिट्टी की गुणवत्ता और फसल दोनों पर दिखाई देने लगा।

छोटे खेत में उगा रहे 50 से ज्यादा किस्म के केले

कल्पेश के पास करीब आठ बीघा जमीन है। इनमें से साढ़े तीन बीघा क्षेत्र में वे केले की 50 से अधिक किस्मों की खेती कर रहे हैं। उनके खेत में पुवन, अधपुरी, रस्थाली, रेड बनाना, ब्लू जावा, बसराई, महालक्ष्मी और इलायची केले जैसी कई दुर्लभ किस्में मौजूद हैं।

प्राकृतिक तरीके से तैयार किए गए इन फलों की मांग बाजार में तेजी से बढ़ रही है। लोग रसायनमुक्त फलों को पसंद कर रहे हैं, जिसका सीधा फायदा कल्पेश को मिल रहा है।

रिकॉर्ड उत्पादन ने बढ़ाई पहचान

प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उनके खेत की मिट्टी पहले से ज्यादा उपजाऊ हो गई। इसका असर उत्पादन पर भी पड़ा। वर्ष 2025 में उनके खेत में उगा केले का एक गुच्छा 73 किलो तक पहुंच गया, जिसने लोगों का ध्यान खींचा। सामान्य तौर पर केले का एक गुच्छा करीब 20 किलो का माना जाता है, जबकि कल्पेश के खेत में औसत वजन 30 किलो से अधिक रहता है।

खेती की लागत भी काफी कम हुई है। कल्पेश के अनुसार, प्रति बीघा हर साल 15 से 20 हजार रुपये तक की बचत सिर्फ इसलिए हो रही है क्योंकि अब उन्हें रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर खर्च नहीं करना पड़ता।

वैल्यू एडिशन से बढ़ाई आमदनी

कल्पेश सिर्फ खेती तक सीमित नहीं हैं। वे अपने उत्पादों की प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन पर भी जोर देते हैं। यदि बाजार में कच्चे केले नहीं बिकते, तो वे उनसे केले के वेफर्स, बनाना फिग और बनाना पाउडर तैयार करते हैं। इससे फसल खराब होने का नुकसान कम होता है और कमाई भी बढ़ती है।

वे “मेरा उत्पाद, मेरी कीमत” के सिद्धांत पर काम करते हैं और अपने उत्पाद सीधे ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। सूरत के वेसु स्थित प्राकृतिक कृषि बाजार में वे नियमित रूप से अपने उत्पाद बेचते हैं।

प्राकृतिक खेती से कल्पेश की आय में भी बड़ा बदलाव आया है। वे साढ़े तीन बीघा जमीन से हर साल करीब 10 से 12 लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं। कम लागत और बेहतर उत्पादन ने उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत की है।

सरकार भी दे रही बढ़ावा

गुजरात सरकार राज्य में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में किसानों को रसायनमुक्त खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। राज्यपाल आचार्य देवव्रत भी लगातार किसानों के बीच जाकर प्राकृतिक खेती का प्रचार कर रहे हैं।

सरकार ने कई शहरों में प्राकृतिक खेती बाजार शुरू किए हैं, ताकि किसान सीधे ग्राहकों को अपना उत्पाद बेच सकें और उन्हें बेहतर दाम मिल सके।

राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान

कल्पेश पटेल की सफलता अब गुजरात तक सीमित नहीं रही। उनकी प्राकृतिक खेती मॉडल की चर्चा देशभर में हो रही है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी उनसे बातचीत की और उनकी सफलता की कहानी सोशल मीडिया पर साझा की थी।

आज कल्पेश पटेल उन किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं, जो कम लागत, बेहतर उत्पादन और सुरक्षित खेती का विकल्प तलाश रहे हैं।

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