पुणे : इंटरनेशनल स्कूल स्पोर्ट्स ऑर्गेनाइजेशन (आईएसएसओ) की निदेशक आकांक्षा थापक ने कहा है कि भारत में स्कूल स्तर पर खेलों के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षकों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार प्रशिक्षित करना बेहद जरूरी है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले एक दशक में भारत का खेल तंत्र केवल मैदान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह कई नए क्षेत्रों तक फैल चुका है।
आकांक्षा थापक ने मंगलवार को एएनआई से बातचीत के दौरान यह बातें कहीं। आईएसएसओ, इंटरनेशनल स्कूल फेडरेशन (आईएसएफ) और इंटरनेशनल बास्केटबॉल फेडरेशन (फीबा) के साथ मिलकर एक विशेष पीई एजुकेटर्स अपस्किल प्रोग्राम शुरू कर रहा है। यह कार्यक्रम भारत की पूर्व राष्ट्रीय बास्केटबॉल टीम के कोच वेसेलिन मैटिक के नेतृत्व में 25 मई से 2 जून तक दिल्ली-एनसीआर में आयोजित किया जा रहा है।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्कूल स्तर पर मौजूद उस बड़ी कमी को दूर करना है, जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर के कोचिंग ढांचे की कमी महसूस की जाती है। इसके तहत स्कूलों के शारीरिक शिक्षा शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा, ताकि बच्चों को खेल की शुरुआत से ही सही मार्गदर्शन मिल सके।
कार्यक्रम के बारे में बात करते हुए आकांक्षा थापक ने कहा, “आईएसएसओ हमेशा से स्कूल खेल तंत्र के लिए काम करता आया है और हमें यह करते हुए एक दशक से ज्यादा समय हो चुका है। अब हमें महसूस हुआ कि केवल टूर्नामेंट आयोजित करना काफी नहीं है। इसकी शुरुआत पीई शिक्षकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुरूप प्रशिक्षित करने से होनी चाहिए, ताकि खिलाड़ी भी अपने प्रदर्शन को बेहतर बना सकें। इसी सोच के साथ आईएसएफ के साथ बातचीत शुरू हुई।”
उन्होंने आगे कहा कि आईएसएफ भी अपने कार्यक्रम शुरू करना चाहता था और यह उन्हीं पायलट कार्यक्रमों में से एक है, जिन्हें पिछले छह महीनों में शुरू किया गया है। पहला कार्यक्रम हमने बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन यानी बीडब्ल्यूएफ के साथ किया था और अब इसे फीबा के साथ आयोजित किया जा रहा है। यह साझेदारी खास तौर पर स्कूल स्तर के पीई शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए है, ताकि जब कोई बच्चा खेलना शुरू करे तो उसे शुरुआत से ही सही प्रशिक्षण मिल सके और वह अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण से वंचित न रहे। हमारा मानना है कि भारतीय खेल तंत्र की जड़ में ‘ट्रेनिंग द ट्रेनर’ सबसे अहम हिस्सा है।
भारत में अक्सर देखा जाता है कि बच्चे स्कूलों में बास्केटबॉल, फुटबॉल, हॉकी, टेनिस, बैडमिंटन और ताइक्वांडो जैसे कई खेल खेलते हैं, लेकिन आगे चलकर इन खेलों से उनका जुड़ाव टूट जाता है। इस पर आकांक्षा थपक ने कहा कि इसका एक बड़ा कारण भारतीय परिवारों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और क्रिकेट का अत्यधिक प्रभाव है।
उन्होंने कहा, “देश में प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा है। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा आर्थिक रूप से सफल हो। क्रिकेट जितनी बड़ी पहुंच हर खेल की नहीं है। इसलिए कई परिवार सोचते हैं कि एक समय के बाद खेलों को रोक देना चाहिए, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे करियर नहीं बनेगा। हालांकि पिछले दशक में चीजें काफी बदली हैं। सरकार की कई पहल ने माता-पिता का भरोसा बढ़ाया है कि बच्चे खेल को करियर के रूप में भी अपना सकते हैं।”
आकांक्षा थापक ने यह भी कहा कि पिछले दस वर्षों में खेलों का दायरा मैदान से कहीं आगे बढ़ चुका है। अब यह सिर्फ खेलने तक सीमित नहीं रह गया है।
उन्होंने कहा कि अब खेलों में डेटा एनालिटिक्स, साइकोलॉजी, फिजियोलॉजी और स्पोर्ट्स साइंस जैसे क्षेत्र भी तेजी से बढ़ रहे हैं। अगर कोई खेल जगत का हिस्सा बनना चाहता है, तो अब उसके पास कई विकल्प हैं। पिछले दशक में काफी बदलाव आया है और यह बदलाव आगे भी जारी रहेगा। सरकार की मजबूत कोशिशों और कॉरपोरेट जगत की सीएसआर पहल ने भी खेलों को काफी समर्थन दिया है। इससे माता-पिता का विश्वास और बढ़ा है।
आईएसएसओ की निदेशक के तौर पर भारतीय खेल प्रतिभाओं को लेकर अपने अनुभव साझा करते हुए आकांक्षा थापक ने कहा कि भारत मानसिक क्षमता वाले खेलों में काफी अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन सहनशक्ति आधारित खेलों में अभी और मेहनत की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि हम जानते हैं कि भारतीय दिमाग बेहद तेज होता है। इसलिए शतरंज, फेंसिंग, शूटिंग जैसे खेलों में, जहां मानसिक एकाग्रता और क्षमता की जरूरत होती है, भारत अच्छा कर रहा है। लेकिन स्टैमिना आधारित खेलों में हमें अभी काफी मेहनत करनी होगी। रैकेट खेलों में भी भारत लगातार बेहतर हो रहा है और आने वाले समय में इन खेलों में और बड़ी सफलता देखने को मिल सकती है।