नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली रेस क्लब को राहत देने वाले अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही केंद्र सरकार को लुटियंस दिल्ली स्थित 84 एकड़ परिसर से क्लब को बेदखल करने की कार्रवाई आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।
मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया के खंडपीठ ने एकल पीठ के उस आदेश को बरकरार रखने से इनकार कर दिया, जिसमें एस्टेट ऑफिसर को दिल्ली रेस क्लब को जारी कारण बताओ नोटिस पर आगे की कार्रवाई करने से रोका गया था। अदालत ने कहा कि अनधिकृत कब्जाधारियों को हटाना संबंधित प्राधिकरणों का वैधानिक अधिकार है।
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा, “यह अपील स्वीकार की जाती है और 24 अप्रैल 2026 को पारित एकल न्यायाधीश के आदेश का वह हिस्सा रद्द किया जाता है, जिसमें एस्टेट ऑफिसर को कारण बताओ नोटिस पर आगे कार्रवाई से रोका गया था।”
केंद्र सरकार ने 13 मार्च को दिल्ली रेस क्लब को नोटिस जारी कर कहा था कि क्लब परिसर पर लगातार अनधिकृत रूप से कब्जा बनाए हुए है। सरकार ने यह भी कहा कि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जमीन की आवश्यकता है, इसलिए परिसर का शांतिपूर्ण कब्जा सौंपा जाए। इसके बाद 17 अप्रैल को अधिकारियों ने सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम के तहत कार्रवाई शुरू की और क्लब को कारण बताओ नोटिस जारी किया। नोटिस में पूछा गया था कि अनधिकृत कब्जे के कारण बेदखली और हर्जाने की वसूली का आदेश क्यों न पारित किया जाए।
दिल्ली रेस क्लब ने इस नोटिस को हाईकोर्ट के एकल पीठ में चुनौती दी थी। एकल पीठ ने अंतरिम राहत देते हुए एस्टेट ऑफिसर को 30 जुलाई तक नोटिस पर आगे कार्रवाई करने से रोक दिया था।
हालांकि अब खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ का आदेश टिकाऊ नहीं था क्योंकि उसमें अपूरणीय क्षति, प्रथम दृष्टया मजबूत मामला और सुविधा के संतुलन जैसे आवश्यक कानूनी पहलुओं पर कोई स्पष्ट चर्चा या निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया था।
अदालत ने कहा कि बिना पर्याप्त कारण बताए और बिना यह तय किए कि क्लब के पक्ष में प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, केंद्र सरकार के वैधानिक अधिकार को रोका नहीं जा सकता। अदालत के अनुसार सार्वजनिक परिसर अधिनियम की धारा 4 के तहत कार्रवाई करना सरकार का कानूनी अधिकार है।
खंडपीठ ने दिल्ली रेस क्लब की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि 17 अप्रैल का नोटिस पहले से तय योजना के तहत जारी किया गया और यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि कोई प्राधिकरण सार्वजनिक परिसर अधिनियम के तहत अपने वैधानिक अधिकार का उपयोग करता है तो उसे कानून का दुरुपयोग नहीं कहा जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि क्लब की लीज 1994 में ही समाप्त हो चुकी थी। ऐसे में केंद्र सरकार को सार्वजनिक परिसर अधिनियम की धारा 4 के तहत कार्रवाई करने का पूरा अधिकार प्राप्त है। केंद्र सरकार का कहना है कि लोक कल्याण मार्ग स्थित 84.48 एकड़ जमीन के लिए 1926 में हुई लीज स्थायी प्रकृति की नहीं थी और इसकी अवधि 31 दिसंबर 1994 को समाप्त हो गई थी। सरकार के मुताबिक इसके बाद कोई विस्तार नहीं दिया गया, इसलिए क्लब का परिसर पर कब्जा अनधिकृत माना जाएगा और उसके खिलाफ सार्वजनिक परिसर अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है।