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अप्रैल में 42 दवाओं के बैच गुणवत्ता जांच में फेल, सीडीएससीओ रिपोर्ट से हड़कंप

सीडीएससीओ की जांच में ‘नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी’ के रूप में चिह्नित दवाएं

नई दिल्ली : व्यापक रूप से उपयोग होने वाली ज्वर की दवा पैरासिटामोल से लेकर मधुमेह की दवा मेटफॉर्मिन, या गैस–एसिडिटी की दवा पैंटोप्राजोल, यहां तक कि प्रसवोत्तर रक्तस्राव को रोकने वाली दवा मिसोप्रोस्टोल— देश के बाजार में प्रचलित 42 दवाओं के बैच केंद्रीय गुणवत्ता परीक्षण में फेल हो गए हैं। केंद्रीय औषधि नियामक संस्था सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (सीडीएससीओ) की अप्रैल की गुणवत्ता जांच में इन बैचों को ‘नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी’ (एनएसक्यू) या निर्धारित मानक पूरा करने में विफल के रूप में चिन्हित किया गया है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन सीडीएससीओ नियमित रूप से देश के विभिन्न हिस्सों में बाजार में बिक रही दवाओं के नमूने एकत्र कर प्रयोगशालाओं में परीक्षण के लिए भेजता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाजार में उपलब्ध दवाएं निर्धारित मानकों का पालन कर रही हैं या नहीं। अप्रैल की रिपोर्ट में 42 बैचों को मानक परीक्षण में अनुत्तीर्ण पाया गया है। इनमें पैरासिटामोल, पैंटोप्राजोल और मेटफॉर्मिन जैसी व्यापक रूप से उपयोग होने वाली दवाओं के अलावा विभिन्न प्रकार के एंटीबायोटिक, दर्द निवारक और क्रॉनिक रोगों के उपचार में उपयोग होने वाली कई दवाएं शामिल हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि किसी दवा का एनएसक्यू के रूप में चिह्नित होना यह नहीं दर्शाता कि वह नकली या सीधे तौर पर हानिकारक है। इसका अर्थ यह होता है कि वह विशेष बैच निर्धारित मानकों में से किसी एक या अधिक परीक्षणों में असफल रहा है। उदाहरण के तौर पर, दवा की घुलनशीलता परीक्षण, सक्रिय तत्व की मात्रा, शुद्धता, स्थिरता या लेबल संबंधी जानकारी में असंगति पाई जा सकती है। जैसे यदि कोई टैबलेट शरीर में निर्धारित समय के भीतर ठीक से घुल नहीं पाती तो अपेक्षित प्रभाव नहीं मिल सकता।

हालांकि हर महीने कई बैचों का इस प्रकार गुणवत्ता परीक्षण में असफल होना स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। हर महीने देखा जा रहा है कि विभिन्न दवाओं के बैच लगातार गुणवत्ता परीक्षण में विफल हो रहे हैं। मार्च में भी कई दर्जन दवाओं के बैच एनएसक्यू सूची में शामिल थे। उससे पहले के महीनों में भी इसी तरह की रिपोर्ट सामने आई थी। इसलिए इसे एक अलग घटना नहीं बल्कि निगरानी प्रणाली के तहत बार-बार सामने आने वाली प्रवृत्ति माना जा रहा है।

एक स्वास्थ्य अधिकारी के अनुसार, “चिंता की बात यह है कि जब तक बाजार से नमूने एकत्र कर परीक्षण रिपोर्ट प्रकाशित होती है, तब तक कई बार वह असफल बैच बाजार में बिक चुका होता है और लोग अनजाने में उसका उपयोग कर लेते हैं।”

विशेषज्ञों का मानना है कि हर महीने कुछ दवाओं का फेल होना निगरानी व्यवस्था की सक्रियता का संकेत भी है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि बाजार में उपलब्ध दवाओं की नियमित जांच हो रही है। किसी बैच के फेल होने पर आमतौर पर निर्माता कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा जाता है, संबंधित बैच को बाजार से वापस लेने का निर्देश दिया जाता है या अतिरिक्त जांच की जाती है। हालांकि जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि व्यापक रूप से उपयोग होने वाली दवाओं में इस तरह की बार-बार की विफलता आम जनता में चिंता पैदा कर सकती है। विशेषकर क्रॉनिक रोगों के मरीजों के लिए दवाओं की गुणवत्ता पर भरोसा बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

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