मुख्यमंत्री की प्रशासनिक बैठक में विपक्षी पार्टी के विधायकों और सांसदों की उपस्थिति! मंगलवार (26 मई) को कल्याणी में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की प्रशासनिक बैठक में कुछ ऐसा ही दृश्य नजर आया। इससे पहले आखिरी बार कब ऐसी घटना घटी होगी, शायद ही किसी को याद होगी। इस प्रशासनिक बैठक में राज्य की विरोधी पार्टी तृणमूल के 7 विधायक और सांसदों की मौजूदगी ने कई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दिया है।
मंगलवार यानी 26 मई को कल्याणी के एपीजे अब्दुल कलाम ऑडिटोरियम में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने उत्तर 24 परगना, नदिया और हुगली जिलों के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक की। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री के निर्देश पर ही इस बैठक में विपक्षी पार्टी के विधायकों को बुलाया गया था।
इसी वजह से बारासात से तृणमूल सांसद काकोली घोषदस्तीदार भी इस बैठक में शामिल हुईं। उनके साथ-साथ उत्तर 24 परगना में तृणमूल के कुल 9 विधायकों में से 6 विधायक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की बैठक में उपस्थित रहे। इनमें स्वरूपनगर की बीणा मंडल, देगंगा से अनिसुर रहमान, हाड़वा से अब्दुल मातिन, बादुरिया से बुरहानुल मुक्द्दीम, बसिरहाट दक्षिण के सुरजीत मित्रा और मिनाखां की उषारानी मंडल भी शामिल रही।
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बंगाल की राजनीति से जुड़े जानकारों का मानना है कि पिछले 15 वर्षों में राज्य में ऐसा नजारा कभी देखने को नहीं मिला था। आरोप है कि किसी भी प्रशासनिक बैठक में विपक्षी दल के सांसद, विधायक या अन्य जनप्रतिनिधियों को नहीं बुलाया जाता था। विभिन्न समितियों के प्रमुखों को कई प्रशासनिक बैठकों में आमंत्रित किया गया, लेकिन विपक्षी पार्टी के जनप्रतिनिधियों को कभी नहीं बुलाया गया।
वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद जब शुभेंदु अधिकारी विपक्ष के तत्कालीन नेता बने, तब उन्होंने विधानसभा में कई बार इस मुद्दे को उठाया था। आखिरकार सत्ता परिवर्तन के बाद अब वह तस्वीर बदलती नजर आई। बड़ी संख्या में लोगों का यह भी मानना है कि नई सरकार के इस फैसले से पिछले लंबे समय से चली आ रही 'राजनीतिक संस्कृति' में बदलाव आ सकता है।
"हमें नहीं मिलता था बुलावा"
प्रशासनिक बैठक के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कटाक्ष करते हुए कहा कि पिछले पांच वर्षों में हमें तो कभी बुलावा नहीं मिला था। यहां तक कि हमारे सांसदों के फोन भी बीडीओ और ओसी नहीं उठाते थे। आज यहां बसिरहाट के विधायक मौजूद थे। उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया गया। हम चाहते हैं कि केंद्र और राज्य ‘डबल इंजन’ के लाभ का उपयोग करें। पूरे साल रचनात्मक विचारों के साथ काम करें।
मुख्यमंत्री ने कहा कि विपक्षी जनप्रतिनिधियों ने बैठक में सहयोग भी किया और उनमें से कुछ ने बैठक को संबोधित भी किया। काकोली घोषदस्तीदार के बारे में शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि उन्हें मैंने खुद बुलाने के लिए कहा था। वह मंच पर भी मौजूद थीं।
जाते समय उन्होंने हाथ मिलाया और कहा कि ऐसी बैठक पहले कभी नहीं देखी। पहले तो बोलने ही नहीं दिया जाता था। वहीं बरानगर से भाजपा के विधायक सजल घोष ने कहा कि सरकार सभी की होती है। लोकतंत्र में इस तरह की जगह होनी ही चाहिए।
क्या पार्टी की अनुमति थी?
इस बारे में विधायक अनीसुर रहमान ने कहा कि मैं पहली बार विधायक बना हूं। पहली बार मुझे इस तरह की बैठक का निमंत्रण मिला। इस मामले में पार्टी की ओर से कोई निर्देश नहीं था। मैं अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति जवाबदेह हूं। विकास के लिए राज्य सरकार से सहयोग करना ही होगा। वहीं हाड़वा के विधायक अब्दुल मातिन ने कहा कि यहां पार्टी की अनुमति की क्या जरूरत है? यह बैठक तो विकास के हित में ही है।
पार्टी की अनुमति के सवाल पर तृणमूल के प्रवक्ता अरुप चक्रवर्ती ने कहा कि इस मुद्दे पर पार्टी की आधिकारिक स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। हालांकि यह माना जा सकता है कि विकास के हित में ही पार्टी के विधायक प्रशासनिक बैठक में गए थे। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
इसे भूलना नहीं चाहिए। पार्टी प्रमुख इस विषय पर समीक्षा करेगा। वहीं उलुबेड़िया पूर्व से तृणमूल विधायक ऋतव्रत बनर्जी का मानना है कि लोकतंत्र में विपक्ष को अपनी बात कहने का अवसर मिलना जरूरी है।
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गौरतलब है कि शुभेंदु अधिकारी की प्रशासनिक बैठक तृणमूल सांसद काकोली घोषदस्तीदार की मौजूदगी को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। इसकी वजह उनका एक सोशल मीडिया पोस्ट माना जा रहा है जिसमें उन्होंने 'वफादारी का इनाम मिला' लिखकर पोस्ट किया था।
उन्होंने इस पोस्ट के बाद ही बारासात संगठनात्मक जिला तृणमूल अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था जिसके बाद राजनीतिक माहौल और भी गर्मा गया था। ऐसे में उनका शुभेंदु अधिकारी की प्रशासनिक बैठक में पहुंचना, चर्चाओं में छाया रहा। हालांकि बाद में देखा गया कि सिर्फ काकोली घोषदस्तीदार ही नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस के 6 विधायक भी इस बैठक में शामिल हुए।
इससे पहले लगभग 4 साल पहले सिलीगुड़ी में आयोजित आदिवासी परिषद की बैठक में मालदह उत्तर से भाजपा सांसद खगेन मुर्मू और अलीपुरदुआर के पूर्व विधायक दशरथ तिरके को आमंत्रित किया गया था। उस बैठक में खगेन मुर्मू शामिल भी हुए थे। लेकि ऐसे उदाहरणों की संख्या काफी कम ही रही है।
दूसरी तरफ राज्य के मुख्य सचिव मनोज कुमार अग्रवाल ने भी नई सरकार की इस पहल का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक बैठकों में विपक्ष का शामिल होना एक अच्छी बात है। यह मुख्यमंत्री का नीतिगत निर्णय है।