🔔 ताज़ा ख़बरें सबसे पहले!

Samachar EiSamay की ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, खेल, मनोरंजन और बिज़नेस अपडेट अब सीधे आपके पास।

भारत के पहले ओलंपिक तीरंदाजी दल के सदस्य श्याम लाल मीणा का निधन

1988 सियोल ओलंपिक में किया था भारत का प्रतिनिधित्व, 1989 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

By शिखा सिंह

May 26, 2026 18:37 IST

बांसवाड़ा(राजस्थान) : भारत के अनुभवी ओलंपियन तीरंदाज और देश की पहली ओलंपिक तीरंदाजी टीम के सदस्य रहे श्याम लाल मीणा का रविवार रात लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 61 वर्ष के थे।

श्याम लाल मीणा पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे और उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद अस्पताल में इलाज चल रहा था। बताया जा रहा है कि हाल के वर्षों में वह लीवर संबंधी जटिलताओं से जूझ रहे थे।

4 मार्च 1965 को राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के केवाड़िया गांव में जन्मे श्याम लाल मीणा ने बेहद साधारण परिस्थितियों से निकलकर भारतीय तीरंदाजी के शुरुआती दौर के प्रमुख चेहरों में अपनी पहचान बनाई। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने पारंपरिक बांस के धनुष से अभ्यास शुरू किया था। बाद में सरकार की स्पेशल एरिया गेम्स (एसएजी) योजना के जरिए उनकी प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर मिला।

श्याम लाल मीणा वर्ष 1987 में कोलकाता में आयोजित एशियाई तीरंदाजी चैंपियनशिप में भारतीय पुरुष रिकर्व टीम का हिस्सा थे। इस टीम में उनके साथ मशहूर तीरंदाज लिम्बा राम और रजत हलदार भी शामिल थे। भारतीय टीम ने उस प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता था, जिसे भारतीय तीरंदाजी इतिहास का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक माना जाता है।

इस उपलब्धि की बदौलत भारत ने सियोल ओलंपिक 1988 के लिए क्वालीफाई किया था। यह पहली बार था जब भारत ने ओलंपिक खेलों में तीरंदाजी स्पर्धा में हिस्सा लिया।

इसके बाद श्याम लाल मीणा ने अंतिम ओलंपिक टीम में जगह बनाई और लिम्बा राम तथा संजीवा सिंह के साथ 1988 सियोल ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इस तरह वह भारत की पहली ओलंपिक तीरंदाजी टीम का हिस्सा बने।

सियोल ओलंपिक में श्याम लाल मीणा व्यक्तिगत क्वालीफिकेशन राउंड में 71वें स्थान पर रहे, जबकि भारतीय पुरुष रिकर्व टीम ने कुल मिलाकर 20वां स्थान हासिल किया।

भारतीय तीरंदाजी में उनके योगदान को देखते हुए वर्ष 1989 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

अपने करियर के दौरान श्याम लाल मीणा ने कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया और राजस्थान समेत देश के कई हिस्सों में तीरंदाजी को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई।

प्रतिस्पर्धी खेलों से संन्यास लेने के बाद भी वह तीरंदाजी से जुड़े रहे। बांसवाड़ा के जिला खेल प्रशिक्षण केंद्र में कोच के रूप में उन्होंने युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया और जमीनी स्तर पर इस खेल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान निभाया।

Articles you may like: