कोलकाताः पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पद से विदाई लेते समय सीवी आनंद बोस (C. V. Ananda Bose) भावुक नजर आए। राज्य छोड़ने से पहले उन्होंने बंगाल के लोगों के नाम एक खुला पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने इस राज्य के प्रति अपना गहरा लगाव जताया। अपने संदेश में उन्होंने पश्चिम बंगाल को “दूसरा घर” बताया और मां दुर्गा से राज्यवासियों के लिए सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना की।
इसी बीच राज्य में नए संवैधानिक प्रमुख के रूप में आर एन रवि (R. N. Ravi) की तैनाती हो चुकी है। वे बुधवार शाम को कोलकाता पहुंचे और गुरुवार को सुबह साढ़े 11 बजे लोकभवन (पूर्व राजभवन) में पश्चिम बंगाल के 22वें राज्यपाल के रूप में शपथ लेंगे।
ममता बनर्जी से मुलाकात
राज्य छोड़ने से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने बोस से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के बाद ममता बनर्जी ने मीडिया से कहा था कि पूर्व राज्यपाल के साथ “अन्याय हुआ है।”
बोस से जब इस टिप्पणी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कोई प्रतिवाद नहीं किया। उन्होंने शांत स्वर में कहा कि मुख्यमंत्री के पास क्या जानकारी है, यह उन्हें नहीं मालूम, लेकिन जब उन्होंने ऐसा कहा है तो उसके पीछे निश्चित ही कोई कारण होगा।
बोस के मुताबिक, यह मुलाकात पूरी तरह शिष्टाचार के तहत हुई थी। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री उनसे मिलने आईं, बातचीत हुई और दोनों के बीच हमेशा एक पेशेवर तथा सौजन्यपूर्ण संबंध रहा। उन्होंने यह भी बताया कि बंगाल की परंपरा के अनुसार ममता बनर्जी उन्हें विदाई देने आई थीं।
टकराव से लेकर ‘मिठास’ तक
राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कई मौकों पर बोस और राज्य सरकार के बीच मतभेद और टकराव की स्थिति भी बनी थी। विभिन्न प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच सार्वजनिक तौर पर असहमति देखने को मिली थी।
हालांकि विदाई के समय बोस ने इस पूरे दौर को अलग नजरिए से देखते हुए कहा कि रिश्तों में खट्टा-मीठा दोनों होता है। उनके शब्दों में, “टकराव और मिठास दोनों ही संबंधों का हिस्सा हैं, लेकिन अब रिश्तों में मिठास आ गई है।”
दिलचस्प बात यह रही कि अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में बोस राजभवन के बजाय राज्य सरकार के गेस्ट हाउस में रह रहे थे।
विपक्ष के नेता से मतभेद की चर्चा
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा थी कि राज्य के विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) के साथ बोस के संबंधों में कुछ मतभेद सामने आए थे।
हालांकि बोस ने इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि विपक्ष के नेता के साथ उनके संबंध अच्छे रहे हैं और उनके बीच किसी तरह का विवाद नहीं था।
इस्तीफे के फैसले पर बोस की सफाई
अपने अचानक पद छोड़ने के फैसले के बारे में बोस ने कहा कि यह उनका व्यक्तिगत निर्णय था। उन्होंने बताया कि उन्होंने करीब 40 महीनों तक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में काम किया।
उनके अनुसार, एक समय ऐसा आया जब उन्हें लगा कि अब रुकने का समय है। उन्होंने कहा, “खेल का नियम यही है कि आपको यह समझना चाहिए कि कब रुकना है। मेरी अंतरात्मा ने संकेत दिया कि अब पद छोड़ने का समय आ गया है।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अपने पूरे कार्यकाल में उन्होंने खुद को राजनीति से दूर रखा और किसी भी राजनीतिक दबाव को अपने फैसलों पर हावी नहीं होने दिया।
खुले पत्र में बंगाल के प्रति लगाव
विदाई के मौके पर लिखे गए अपने खुले पत्र में बोस ने पश्चिम बंगाल के लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने लिखा कि राज्य के लोगों ने उन्हें जो सम्मान, स्नेह और समर्थन दिया, उसके लिए वे दिल से कृतज्ञ हैं। पत्र में उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल उनके लिए सिर्फ एक कार्यस्थल नहीं रहा, बल्कि यह उनका “दूसरा घर” बन गया है और वे आगे भी इस राज्य से अटूट रूप से जुड़े रहना चाहते हैं।
अपने संदेश में उन्होंने महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) का एक पुराना कथन भी उद्धृत किया-“मैं बंगाल को छोड़कर नहीं जा सकता और बंगाल मुझे छोड़ने नहीं देगा।”
इस उद्धरण के बाद राजनीतिक हलकों में यह अटकलें भी शुरू हो गई हैं कि भविष्य में बोस को किसी नई भूमिका में फिर से बंगाल से जुड़ा देखा जा सकता है।
भाजपा की प्रतिक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम पर भाजपा नेता देबजीत सरकार (Debajit Sarkar) ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर तंज कसते हुए कहा कि भविष्य में उनके पास काफी समय होगा और तब वे देख पाएंगी कि उन्होंने बंगाली भाषा कितनी सीखी है। फिलहाल, पश्चिम बंगाल की राजनीति की निगाहें नए राज्यपाल आरएन रवि के शपथ ग्रहण समारोह पर टिकी हुई हैं, जो गुरुवार को लोकभवन में आयोजित होने वाला है।