नई दिल्ली: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने सुप्रीम कोर्ट में दायर उस याचिका का विरोध किया है, जिसमें इस्लामी विरासत कानून को खत्म करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव करता है।
क्या है मामला: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक संगठन नया नारी फाउंडेशन ने याचिका दायर की है। इसमें कहा गया है कि 1937 के शरियत कानून के तहत जो विरासत के नियम हैं, वे महिलाओं के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं करते, इसलिए इन्हें रद्द किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि समान नागरिक संहिता लागू करने का समय आ गया है। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर शरियत का विरासत कानून रद्द कर दिया गया तो एक कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है, क्योंकि मुस्लिम विरासत के लिए कोई अलग सरकारी कानून मौजूद नहीं है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की आपत्ति: लॉ बोर्ड इस याचिका को शरारतपूर्ण” और बेबुनियाद बताया है। बोर्ड का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सभी को अपनी धार्मिक परंपराओं और कानूनों का पालन करने की स्वतंत्रता है, इसलिए इस्लामी विरासत कानून को खत्म करने की मांग गलत है।
बोर्ड का तर्क: लॉ बोर्ड के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि इस्लामी पारिवारिक कानून कुरान और सुन्नत से जुड़े हुए हैं, इसलिए मुसलमानों के लिए उनका पालन करना जरूरी माना जाता है।
महिलाओं के हिस्से पर स्पष्टीकरण: बोर्ड ने यह भी कहा कि यह कहना सही नहीं है कि इस्लामी विरासत कानून हमेशा महिलाओं के साथ भेदभाव करता है। कई मामलों में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हिस्सा मिलता है, कभी-कभी उनसे ज्यादा भी मिलता है और कुछ स्थितियों में सिर्फ महिलाओं को ही विरासत मिलती है।
UCC पर भी विरोध: लॉ बोर्ड का कहना है कि समान नागरिक संहिता केवल संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में एक सुझाव है, इसे किसी समुदाय पर जबरन लागू नहीं किया जा सकता। बोर्ड ने उत्तराखंड में लागू UCC कानून को भी असंवैधानिक बताया है और इसे अदालत में चुनौती दी है।