नई दिल्ली/कोलकाता : मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार सोमवार को पश्चिम बंगाल आए थे, जहां उन्होंने राज्य प्रशासन से लेकर पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को कड़ी चेतावनी भरे लहजे में कई बातें कहीं। उन्होंने यह भी कहा कि वह “रक्तपात-रहित और शांतिपूर्ण” विधानसभा चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
इसके जवाब में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए सीईसी को अपनी “कुर्सी बचाने” का संदेश दिया। वहीं सांसद और तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी विवेक के मुद्दे को उठाते हुए उन पर कटाक्ष किया।
इसी बीच तृणमूल कांग्रेस ने संसद के बजट सत्र के पहले चरण में ही ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की घोषणा की है। खबर है कि इस प्रस्ताव को पेश करने के लिए तृणमूल काफी आगे बढ़ चुकी है और कई विपक्षी सांसद इस पर हस्ताक्षर भी कर रहे हैं। यदि सब कुछ ठीक रहा तो इसी सप्ताह संसदीय कार्यालय में महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जा सकता है।
पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के नाम पर सीईसी पश्चिम बंगाल में धांधली कर रहे हैं। तृणमूल सूत्रों के अनुसार महाभियोग प्रस्ताव की 10 पन्नों की नोटिस में यह भी उल्लेख होगा कि ज्ञानेश कुमार पद और अधिकारों का दुरुपयोग कर बंगाल के मतदाताओं से उनका मतदान अधिकार छीन रहे हैं और उनके साथ “दुर्व्यवहार” कर रहे हैं।
कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल तृणमूल की मांग का समर्थन कर रहे हैं। संसदीय नियमों के अनुसार, इस तरह की नोटिस पेश करने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। तृणमूल के सूत्रों का दावा है कि विपक्षी सांसद इस नोटिस पर हस्ताक्षर करने को लेकर काफी उत्साहित हैं, इसलिए आवश्यक संख्या जुटाने में कोई समस्या नहीं होगी।
हालांकि नोटिस जमा हो जाने के बाद भी इस पर तुरंत फैसला नहीं होगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के एक-एक न्यायाधीश तथा एक विधि विशेषज्ञ को लेकर तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति गठित की जाएगी। यह समिति सभी पहलुओं और संवैधानिक मानकों के आधार पर नोटिस के भविष्य का निर्णय करेगी।
यदि महाभियोग प्रस्ताव की नोटिस स्वीकार कर ली जाती है, तो संसद में इस पर चर्चा शुरू होगी और अंत में मतदान कराया जाएगा। लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ दल के बहुमत के कारण यह लगभग तय है कि यह प्रस्ताव खारिज हो जाएगा। तृणमूल सहित विपक्षी दल भी यह बात जानते हैं। साथ ही माना जा रहा है कि इस पूरी प्रक्रिया के खत्म होने से पहले ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हो जाएंगे।
तो फिर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ यह महाभियोग प्रस्ताव क्यों लाया जा रहा है?
विपक्षी दलों का कहना है कि देश के इतिहास में पहले कभी किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव नहीं लाया गया। इसलिए इस कदम से आम नागरिकों के एक बड़े वर्ग के बीच ज्ञानेश कुमार की छवि पर सवाल उठेगा। संसद में संख्या के आधार पर हारने के बावजूद जनता की अदालत में यह विरोध तृणमूल सहित विपक्ष के लिए “नैतिक जीत” के रूप में देखा जाएगा।
इसके अलावा विपक्ष यह सवाल भी उठा सकेगा कि जिस मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की नोटिस दायर हो चुकी है, वह पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का संचालन कैसे कर सकते हैं।