नई दिल्लीः भारत की जल प्रबंधन व्यवस्था में मौजूद संरचनात्मक कमजोरियां भविष्य में आर्थिक और वित्तीय चुनौतियों को बढ़ा सकती हैं। वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज रेटिंग्स ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि पानी के प्रबंधन से जुड़ी नीतियों में लचीलापन की कमी, विभिन्न राज्यों में बंटी जिम्मेदारियां और संसाधनों के सीमित उपयोग की वजह से देश को लंबे समय तक जल संकट और उससे जुड़े आर्थिक दबावों का सामना करना पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जल संसाधनों के आवंटन की व्यवस्था अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का भी महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। यह व्यवस्था तय करती है कि घरेलू उपभोक्ताओं, उद्योगों और कृषि क्षेत्र के बीच पानी का वितरण किस तरह होगा और संकट की स्थिति में प्राथमिकता किसे मिलेगी। इसी आधार पर यह भी तय होता है कि पानी की कमी का असर सरकारी वित्त, उद्योगों और सार्वजनिक सेवाओं पर कितनी तेजी से पड़ेगा।
मूडीज ने भारत की जल प्रबंधन प्रणाली को "खंडित और अपेक्षाकृत कम लचीला" बताया है। एजेंसी का कहना है कि जल शासन कई स्तरों पर बंटा हुआ है, कीमतों में पर्याप्त लचीलापन नहीं है, विभिन्न क्षेत्रों के बीच पानी का पुनर्वितरण धीमा है और आवश्यक निवेश के लिए स्पष्ट तथा भरोसेमंद ढांचा भी सीमित है।
राज्यों में बंटी जिम्मेदारियां बनी चुनौती
मूडीज ने रेखांकित किया कि भारत में जल प्रबंधन का दायित्व 28 से अधिक राज्यों के बीच विभाजित है। अधिकांश नीतियां और निर्णय राज्य सरकारों के स्तर पर लिए जाते हैं। इस कारण देशभर में एक समान और समन्वित जल प्रबंधन रणनीति लागू करना आसान नहीं होता।
कृषि में सबसे अधिक पानी की खपत
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जल मूल्य निर्धारण व्यापक रूप से सब्सिडी आधारित है। विशेषकर कृषि क्षेत्र को बड़ी रियायतें दी जाती हैं। देश के कुल मीठे पानी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा खेती-किसानी में उपयोग होता है। इसके साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के बीच जल आवंटन में बदलाव की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी रहती है, जबकि कई इलाकों में जल अवसंरचना के विकास के लिए पर्याप्त निवेश और संसाधनों की भी कमी है।
एआई और डेटा सेंटर बढ़ाएंगे दबाव
मूडीज ने भविष्य की एक नई चुनौती की ओर भी संकेत किया है। रिपोर्ट के अनुसार क्लाउड कंप्यूटिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के विस्तार के साथ डेटा सेंटरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इन केंद्रों को संचालन और कूलिंग के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। ऐसे में आने वाले वर्षों में औद्योगिक क्षेत्र की जल मांग और बढ़ सकती है, जिसके लिए सरकारों और जल आपूर्ति एजेंसियों को अतिरिक्त तैयारी करनी होगी।
जलवायु जोखिमों से पहले ही जूझ रहा है भारत
रिपोर्ट में विश्व संसाधन संस्थान (डब्ल्यूआरआई) के अध्ययन का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत पहले से ही अत्यधिक गर्मी, बाढ़ और मानसून की अनिश्चितता जैसे जलवायु जोखिमों के प्रति संवेदनशील है। वहीं जल प्रबंधन के मामले में देश की ऋण जोखिम संवेदनशीलता बहुत अधिक आंकी गई है। इसके पीछे पुरानी जल अवसंरचना, भूजल का अत्यधिक दोहन और संसाधनों पर बढ़ता दबाव प्रमुख कारण हैं।
मूडीज का मानना है कि यदि जल प्रबंधन व्यवस्था को अधिक प्रभावी, समन्वित और निवेश समर्थ नहीं बनाया गया, तो पानी की उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियां आर्थिक विकास, औद्योगिक गतिविधियों और सरकारी वित्तीय स्थिति पर दीर्घकालिक असर डाल सकती हैं।