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कच्छ में ग्रीन एनर्जी हब, जामनगर में गीगा कॉम्प्लेक्स, भारत के ऊर्जा भविष्य पर रिलायंस का मेगा दांव

मुकेश अंबानी ने ऊर्जा ‘सुपर साइकिल’ की भविष्यवाणी की। कच्छ में विशाल ग्रीन एनर्जी हब, बैटरी, ग्रीन अमोनिया और रसायन कारोबार के विस्तार पर फोकस।

By श्वेता सिंह

Jun 19, 2026 19:24 IST

मुंबईः भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा अभी भी विदेशों पर निर्भर है, लेकिन रिलायंस इंडस्ट्रीज इस तस्वीर को बदलने की तैयारी में जुटी है। कंपनी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने ऊर्जा क्षेत्र में आने वाली "सुपर साइकिल" का हवाला देते हुए सौर ऊर्जा, बैटरी, ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन अमोनिया और स्वच्छ ईंधन परियोजनाओं में बड़े निवेश का ऐलान किया है। कंपनी का लक्ष्य केवल कारोबार बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और ऊर्जा सुरक्षा को नई मजबूती देना भी है।

कंपनी की वार्षिक आम बैठक में मुकेश अंबानी ने कहा कि भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अभी भी विदेशों से आयात करता है। यह स्थिति न केवल आर्थिक रूप से महंगी है, बल्कि देश को वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति भी संवेदनशील बनाती है। उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक समाधान यही है कि भारत अपनी अधिकांश ऊर्जा जरूरतों का उत्पादन स्वयं करे और वह भी पर्यावरण-अनुकूल तरीके से।

ऊर्जा, बैटरी और ग्रीन हाइड्रोजन पर रिलायंस का बड़ा दांव

रिलायंस गुजरात के कच्छ में 5.50 लाख एकड़ में विशाल ग्रीन एनर्जी हब विकसित कर रही है, जो पूरी तरह चालू होने पर सालाना 40 अरब यूनिट से अधिक स्वच्छ बिजली पैदा करेगा।

बैटरी निर्माण क्षेत्र में 40 गीगावाट घंटा क्षमता वाले बैटरी सेल संयंत्र का पहला चरण इस वर्ष शुरू होने की उम्मीद है, जिसे आगे बढ़ाकर 120 गीगावाट घंटा प्रतिवर्ष किया जाएगा।

जामनगर के धीरूभाई अंबानी ग्रीन एनर्जी गीगा कॉम्प्लेक्स में सौर मॉड्यूल उत्पादन शुरू हो चुका है। कंपनी 20 गीगावाट वार्षिक एकीकृत सौर विनिर्माण क्षमता विकसित करने की योजना पर काम कर रही है।

इन परियोजनाओं के जरिए रिलायंस नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण और स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों में वैश्विक स्तर की उपस्थिति स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। साथ ही ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया पर भी फोकस बढ़ाया जा रहा है। सैमसंग सी एंड टी के साथ 3 अरब डॉलर का समझौता इस बात का संकेत है कि रिलायंस केवल घरेलू बाजार ही नहीं, बल्कि वैश्विक हरित ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहती है।

पारंपरिक ऊर्जा से दूरी नहीं, संतुलित रणनीति पर जोर

दिलचस्प बात यह है कि रिलायंस पूरी तरह पारंपरिक ऊर्जा से बाहर नहीं निकल रही। कंपनी तेल और गैस कारोबार में निवेश जारी रखने की योजना बना रही है। ब्रिटिश कंपनी बीपी के साथ संयुक्त उद्यम वर्तमान में भारत के घरेलू गैस उत्पादन का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध करा रहा है।

जामनगर रिफाइनरी, जो दुनिया का सबसे बड़ा एकल-स्थान रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स है, अभी भी रिलायंस के ऊर्जा कारोबार का मजबूत आधार बनी हुई है। पश्चिम एशिया में तनाव और आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों के बावजूद इस रिफाइनरी ने लगभग पूरी क्षमता से संचालन जारी रखा।

इसके साथ ही कंपनी उच्च मूल्य वाले रसायनों के कारोबार का विस्तार कर रही है। इस क्रम में पीटीए संयंत्र, हजीरा में कार्बन फाइबर इकाई और नागोठाणे में पीवीसी परियोजना इस रणनीति क हिस्सा हैं। इसका अर्थ यह है कि रिलायंस ऊर्जा संक्रमण के दौरान अपने मौजूदा लाभकारी कारोबार को कमजोर किए बिना भविष्य की तकनीकों में निवेश कर रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह संतुलित दृष्टिकोण कंपनी को जोखिम कम करने और स्थिर नकदी प्रवाह बनाए रखने में मदद करेगा।

भारत की अर्थव्यवस्था, रोजगार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा

रिलायंस की ऊर्जा परियोजनाओं का प्रभाव केवल कंपनी तक सीमित नहीं रहेगा। कंपनी का अनुमान है कि नई ऊर्जा, बैटरी निर्माण, हरित ईंधन और जैव ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाओं के जरिए लगभग दो लाख रोजगार सृजित हो सकते हैं।

यदि भारत घरेलू स्तर पर अधिक ऊर्जा उत्पादन करने में सफल होता है, तो आयात बिल में कमी आएगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और ऊर्जा कीमतों में स्थिरता बढ़ेगी। इससे विनिर्माण क्षेत्र को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है।

हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में भारी पूंजी निवेश की जरूरत होती है। इसके अलावा तकनीकी दक्षता, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और नीति समर्थन भी महत्वपूर्ण कारक होंगे।

फिर भी रिलायंस की यह रणनीति संकेत देती है कि भारत का सबसे बड़ा निजी क्षेत्रीय समूह ऊर्जा क्षेत्र के अगले चरण को आकार देने की तैयारी कर रहा है। यदि योजनाएं तय समय पर सफल होती हैं, तो भारत केवल ऊर्जा उपभोक्ता नहीं बल्कि स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और निर्यात का एक बड़ा वैश्विक केंद्र भी बन सकता है। यही कारण है कि मुकेश अंबानी ऊर्जा क्षेत्र में आने वाली "सुपर साइकिल" को भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर के रूप में देख रहे हैं।

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