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तिब्बत मानवाधिकार उल्लंघन: अमेरिकी सांसदों ने चीन के खिलाफ सख्त रुख अपनाया

अमेरिकी विदेश विभाग को एक साल में रिपोर्ट सौंपने का प्रस्ताव

By प्रियंका महतो

Jun 19, 2026 19:04 IST

वॉशिंगटन डी.सी. : तिब्बत में चीन की नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। संयुक्त राज्य अमेरिका की संसद में वरिष्ठ सांसदों ने यह तय करने की मांग तेज कर दी है कि क्या तिब्बत में चीन की कार्रवाइयाँ अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत नरसंहार या मानवता के खिलाफ अपराध की श्रेणी में आती हैं।

इस मुद्दे पर हाउस सेलेक्ट कमेटी ऑन द चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष कांग्रेसमैन जॉन मोलीनार ने द्विदलीय विधेयक “तिब्बत अत्‍याचार निर्धारण अधिनियम” (Tibet Atrocities Determination Act) का सह-समर्थन किया है। यह विधेयक रिपब्लिकन सांसद क्रिस स्मिथ और डेमोक्रेट सांसद टॉम सुओजी द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

यह प्रस्ताव अमेरिकी विदेश मंत्री को निर्देश देता है कि वे जांच करें कि क्या चीनी अधिकारियों ने तिब्बती जनता के खिलाफ ऐसे कार्य किए हैं जिन्हें नरसंहार या मानवाधिकार उल्लंघन माना जा सकता है। इसके समर्थन में जॉन मोलीनार ने कहा कि अमेरिका को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा तिब्बतियों पर किए जा रहे दमन को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, जो अपनी धार्मिक स्वतंत्रता और पहचान को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

विधेयक के पारित होने की स्थिति में अमेरिकी विदेश विभाग को एक वर्ष के भीतर कांग्रेस को विस्तृत रिपोर्ट सौंपनी होगी, जिसमें तिब्बत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच का विवरण होगा।

प्रस्तावित जांच के दायरे में कई गंभीर आरोप शामिल है, जिनमें मनमानी हत्याएं, यातना, सामूहिक हिरासत, जबरन नसबंदी और धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध शामिल हैं। इसके अलावा राज्य द्वारा संचालित आवासीय विद्यालयों के माध्यम से तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से अलग करने के आरोपों की भी समीक्षा की जाएगी।

रिपोर्टों के अनुसार इस विधेयक का समर्थन करने वाले सांसदों का कहना है कि चीन तिब्बतियों को हान चीनी संस्कृति में समाहित करने और तिब्बती बौद्ध धर्म पर नियंत्रण मजबूत करने के प्रयास तेज कर रहा है। उनका आरोप है कि इससे तिब्बत की सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक पहचान को कमजोर किया जा रहा है।

समर्थकों ने यह भी सुझाव दिया है कि यदि मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप साबित होते है तो संबंधित चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध और वीजा प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए। यह जानकारी समाचार एजेंसी फेयूएल की रिपोर्ट पर आधारित है।

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