कराची/नई दिल्ली : करीब पांच दशक से अधिक समय तक बंगाल की खाड़ी से लगभग गायब रहने के बाद पाकिस्तान एक बार फिर इस रणनीतिक समुद्री क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। चीन निर्मित नई लंबी दूरी की पनडुब्बियों और बांग्लादेश के साथ तेजी से मजबूत होते संबंधों के बल पर इस्लामाबाद अब उस समुद्री क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने का संकेत दे रहा है, जहां लंबे समय से भारत का प्रभाव प्रमुख माना जाता रहा है।
भारतीय रक्षा विशेषज्ञों के एक वर्ग की चिंता का मुख्य कारण पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच बढ़ती सैन्य निकटता है। दोनों देशों के बीच पारस्परिक रक्षा समझौते को लेकर चर्चा चल रही है। प्रस्तावित समझौते में सैन्य सहयोग, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान और नियमित संयुक्त सैन्य अभ्यास जैसे प्रावधान शामिल बताए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता आगे बढ़ता है तो पाकिस्तान को बंगाल की खाड़ी में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। ऐसे परिदृश्य में पाकिस्तान की पनडुब्बियां भारत की पूर्वी समुद्री सुरक्षा व्यवस्था के लिए निगरानी संबंधी चुनौती पैदा कर सकती हैं। विशाखापत्तनम स्थित भारतीय पूर्वी नौसैनिक कमान के निकट किसी भी पाकिस्तानी सैन्य गतिविधि को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाएगा।
पाकिस्तान की इस संभावित वापसी के पीछे चीन की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। इसी वर्ष अप्रैल में चीन ने पाकिस्तान को पहली हांगोर-क्लास पनडुब्बी सौंप दी। यह पनडुब्बी हाल ही में कराची पहुंची। चीन से पाकिस्तान तक इसके सफर के दौरान पाकिस्तानी युद्धपोत ‘पीएनएस तैमूर’ ने इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाई।
कराची पहुंचने से पहले जून के पहले सप्ताह में ‘पीएनएस तैमूर’ ने श्रीलंका के कोलंबो बंदरगाह पर भी ठहराव किया था। 7 जून को कोलंबो के समाचार पत्र ‘द मॉर्निंग’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तानी फ्लोटिला कमांडर कमोडोर उमर फारूक ने कहा था कि नई हांगोर-क्लास पनडुब्बी के शामिल होने से पाकिस्तान अब बंगाल की खाड़ी में भी स्थायी उपस्थिति बनाए रखने में सक्षम होगा।
दक्षिण एशियाई रक्षा अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, ‘हांगोर’ नाम का चयन भी प्रतीकात्मक है। उनका मानना है कि 1971 के युद्ध के दौरान हुए घटनाक्रम और उससे जुड़ी सैन्य स्मृतियों को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान ने अपनी आधुनिक पनडुब्बी श्रृंखला को ‘हांगोर-क्लास’ नाम दिया है। चीन इस श्रृंखला की कुल आठ पनडुब्बियां पाकिस्तान को उपलब्ध कराएगा। पहली पनडुब्बी मिलने के साथ ही पाकिस्तान ने बंगाल की खाड़ी में अपनी भविष्य की सक्रियता का संकेत दे दिया है।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान को करारी हार का सामना करना पड़ा था और उसी युद्ध के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का गठन हुआ था। हालांकि युद्ध के दौरान पाकिस्तान को समुद्री मोर्चे पर एक उल्लेखनीय सफलता भी मिली थी। पाकिस्तानी पनडुब्बी ‘पीएनएस हांगोर’ ने भारतीय युद्धपोत ‘आईएनएस खुकरी’ को डुबो दिया था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी भारतीय युद्धपोत को समुद्र में डुबोया गया था। हालांकि इस घटना का युद्ध के अंतिम परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
बांग्लादेश के गठन के बाद पाकिस्तान नौसेना की गतिविधियां मुख्य रूप से अरब सागर तक सीमित रहीं। लेकिन 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार और उसके बाद तारिक रहमान के प्रभाव वाले वर्तमान राजनीतिक दौर में ढाका और इस्लामाबाद के संबंधों में तेजी से सुधार देखा गया है।
पत्रिका ‘द डिप्लोमैट’ की आर्थिक समीक्षा के अनुसार, दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में 20 से 27 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आर्थिक संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण दोनों देशों के बीच बढ़ता सैन्य सहयोग है।
नवंबर 2025 में पाकिस्तानी युद्धपोत ‘पीएनएस सैफ’ ने चटगांव बंदरगाह पर लंगर डाला था। 1971 के बाद यह पहला अवसर था जब किसी पाकिस्तानी युद्धपोत को बंगाल की खाड़ी के जलक्षेत्र में देखा गया। इस घटना को पाकिस्तान की समुद्री रणनीति में बदलाव का संकेत माना गया था।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून पाकिस्तान की संभावित गतिविधियों को पूरी तरह रोकने की अनुमति नहीं देता। तटीय क्षेत्र से 200 नॉटिकल मील के बाद अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र शुरू हो जाता है, जहां किसी भी देश के युद्धपोतों को आवाजाही का अधिकार प्राप्त है। बंगाल की खाड़ी की चौड़ाई लगभग 540 से 700 नॉटिकल मील के बीच मानी जाती है। ऐसे में कानूनी आधार पर पाकिस्तान की मौजूदगी का विरोध करना आसान नहीं होगा।
इसके बावजूद भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारियों का एक वर्ग मानता है कि भारत के लिए तत्काल किसी बड़े खतरे की आशंका नहीं है। पिछले पांच दशकों में भारतीय नौसेना ने परमाणु शक्ति चालित पनडुब्बियों, दो विमानवाहक पोतों और लंबी दूरी के पी-8आई समुद्री निगरानी विमानों सहित अनेक आधुनिक सैन्य संसाधनों को अपने बेड़े में शामिल किया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान की नौसैनिक क्षमताओं की तुलना में भारत ने अपने समुद्री रक्षा ढांचे को कहीं अधिक मजबूत बनाया है। इसलिए हांगोर-क्लास पनडुब्बियां भारत के लिए कोई बड़ा सामरिक संकट नहीं बनेंगी। फिर भी यदि पाकिस्तान बंगाल की खाड़ी में नियमित रूप से पनडुब्बियों की तैनाती शुरू करता है, तो यह भारत के लिए एक असहज रणनीतिक चुनौती अवश्य साबित हो सकती है।