नई दिल्ली : भारत की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां आने वाले दशक में पारंपरिक बैंकों की तुलना में तेजी से विस्तार कर सकती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऋण देने वाली संस्थाएं अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता का तेजी से उपयोग कर रही हैं और नए-नए ऋण क्षेत्रों में भी अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं, जिससे उनकी वृद्धि की रफ्तार बढ़ने की संभावना है। शोध संस्था नोमुरा की एक रिपोर्ट ने ऐसा दावा किया है।
वर्तमान समय में भारत की ऋण प्रणाली में बैंकों का वर्चस्व बना हुआ है। वित्त वर्ष 2025 तक देश के कुल ऋण में बैंकों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक है, जबकि NBFC का हिस्सा अपेक्षाकृत कम है।
हालांकि नोमुरा का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2025 से 2035 के बीच NBFC का ऋण लगभग 17 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ सकता है, जबकि इसी अवधि में बैंकों के ऋण की वृद्धि दर लगभग 12 प्रतिशत रहने की संभावना है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से NBFC संभावित अच्छे ग्राहकों की पहचान अधिक प्रभावी ढंग से कर सकती हैं और विभिन्न ऋण उत्पादों में कार्यकुशलता को तेजी से बढ़ा सकती हैं। हालांकि इस क्षेत्र में नियामकीय अंतर को लेकर सावधानी बरतने की भी जरूरत बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार आने वाले वर्षों में बैंकों और NBFC के ऋण वृद्धि के बीच का अंतर और बढ़ सकता है।
भारत की ऋण प्रणाली का आकार पहले से ही काफी बड़ा है और वर्तमान में इसमें लगभग 232 ट्रिलियन रुपये (करीब 2.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर) का बकाया ऋण शामिल है। इसके बावजूद बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में देश में ऋण की पहुँच अभी भी अपेक्षाकृत कम मानी जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार जैसे-जैसे लोगों और व्यवसायों को वित्तीय सेवाओं तक अधिक पहुंच मिलेगी, भारत का क्रेडिट-टू-जीडीपी अनुपात आने वाले समय में उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकता है।
हाल के वर्षों में NBFC ने अपने ऋण पोर्टफोलियो को भी काफी विविध बनाया है। पहले ये कंपनियां मुख्य रूप से थोक ऋण पर निर्भर थीं, लेकिन अब वे वाहन ऋण, उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं के लिए वित्तपोषण, व्यक्तिगत ऋण और माइक्रोफाइनेंस जैसे खुदरा क्षेत्रों में भी तेजी से विस्तार कर रही हैं।
इन क्षेत्रों में मांग मजबूत बनी हुई है और खुदरा ऋण NBFC के कारोबार का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है। उम्मीद है कि आगे भी यही क्षेत्र NBFC की वृद्धि के प्रमुख आधार बने रहेंगे।
रिपोर्ट के अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब वित्तीय संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण बनती जा रही है। बैंक और NBFC इसका उपयोग ऋण मूल्यांकन, ग्राहक सहायता, बिक्री और विपणन, साइबर सुरक्षा तथा आंतरिक संचालन को बेहतर बनाने के लिए कर रहे हैं। इसके साथ ही संभावित उधारकर्ताओं की पहचान के लिए वैकल्पिक डेटा का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत के NBFC क्षेत्र में आने वाले समय में प्रतिस्पर्धा तेज हो सकती है, क्योंकि कई वित्तीय संस्थान नए उत्पादों और नए बाजारों में विस्तार करने पर ध्यान दे रहे हैं। पूरे क्षेत्र में एआई आधारित प्रणालियों में निवेश और उनका विकास तेजी से बढ़ रहा है, जिससे ऋण देने की प्रक्रियाओं में बड़े संरचनात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
इस बीच नियामक संस्थाएं भी इस तकनीक के व्यापक उपयोग के लिए तैयारी कर रही हैं। भारत का केंद्रीय बैंक वित्तीय सेवाओं में जिम्मेदार एआई उपयोग के लिए सिफारिशें जारी कर चुका है और उम्मीद की जा रही है कि तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ एक स्पष्ट नियामक ढांचा भी तैयार किया जाएगा।
विश्लेषकों का मानना है कि जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और डिजिटल तकनीक ऋण व्यवस्था को बदलती जाएगी, NBFC की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। विशेष रूप से कम सेवाएं पाने वाले उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायों तक ऋण की पहुँच बढ़ाने में ये कंपनियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।