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तृणमूल के तीन बैंक खातों के डेबिट संचालन पर रोक, पार्टी फंड को लेकर छिड़ी नई जंग

बागी विधायकों की शिकायत, अरूप विश्वास की चिट्ठी और फंड नियंत्रण को लेकर छिड़ी जंग।

By श्वेता सिंह

Jun 20, 2026 00:54 IST

कोलकाताः पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी सत्ता संघर्ष अब पार्टी संगठन और नेतृत्व की लड़ाई से आगे बढ़कर वित्तीय संसाधनों तक पहुंच गया है। पार्टी से जुड़े तीन बैंक खातों के डेबिट संचालन पर रोक लगाए जाने के बाद तृणमूल के भीतर चल रही खींचतान ने नया और अधिक संवेदनशील मोड़ ले लिया है। सूत्रों के अनुसार इन खातों में करीब 440 करोड़ रुपये जमा हैं, जिन्हें लेकर अब राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर सवाल उठने लगे हैं।

पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रही असहमति के बीच यह पहला मौका है जब संगठनात्मक विवाद सीधे तौर पर पार्टी के फंड और बैंक खातों तक पहुंच गया है। इस घटनाक्रम ने यह बहस भी तेज कर दी है कि तृणमूल कांग्रेस के वित्तीय संसाधनों पर नियंत्रण किसके पास रहेगा और पार्टी की ओर से अधिकृत निर्णय लेने का अधिकार किसे प्राप्त है।

बागी विधायकों की शिकायत के बाद बढ़ी हलचल

सूत्रों के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों ने कुछ समय पहले बिधाननगर साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराकर इन बैंक खातों की जांच की मांग की थी। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले समूह से जुड़े लगभग 10 विधायकों ने पुलिस को लिखित शिकायत देकर आशंका जताई थी कि खातों में जमा धनराशि और उससे जुड़े लेन-देन की स्वतंत्र जांच की जानी चाहिए।

विधायकों का कहना था कि जब तक धन के स्रोत और उपयोग की पूरी तस्वीर स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक इन खातों में किसी प्रकार का वित्तीय लेन-देन नहीं होना चाहिए। इसी मांग के बाद मामला और अधिक चर्चा में आ गया।

440 करोड़ रुपये पर उठे सवाल

बागी खेमे का दावा है कि इन खातों में मौजूद धनराशि की उत्पत्ति और उपयोग को लेकर पारदर्शिता जरूरी है। ऋतब्रत बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाते हुए कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि खातों में जमा राशि पूरी तरह वैध स्रोतों से आई हो।

उनका कहना है कि जांच एजेंसियों को यह पता लगाना चाहिए कि कहीं धन का संबंध भ्रष्टाचार, अवैध वसूली, गबन या अन्य वित्तीय अनियमितताओं से तो नहीं है। हालांकि उन्होंने किसी विशेष लेन-देन का उल्लेख नहीं किया, लेकिन पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग दोहराई।

किन खातों को लेकर मचा है विवाद?

शिकायत में खातों के स्वामित्व का विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन चुनाव आयोग के समक्ष पूर्व में जमा कराए गए दस्तावेजों के अनुसार विवादित खातों में से एक अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के नाम पर है। शेष दो खाते पार्टी की त्रिपुरा और गोवा इकाइयों से जुड़े बताए जाते हैं।

यही वजह है कि मामला केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय विस्तार और उससे जुड़े वित्तीय ढांचे पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।

अरूप विश्वास की चिट्ठी ने बदली तस्वीर

इस पूरे घटनाक्रम में वरिष्ठ तृणमूल नेता अरूप विश्वास की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सूत्रों के अनुसार उन्होंने हाल ही में संबंधित बैंक को पत्र लिखकर खातों के संचालन पर रोक लगाने का अनुरोध किया था।

बताया जाता है कि उन्होंने यह पत्र पार्टी के कोषाध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए लिखा। हालांकि 5 जून को हुए संगठनात्मक फेरबदल में पूर्व राज्यसभा सांसद सुभाषिश चक्रवर्ती को नया कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया था, लेकिन बैंक रिकॉर्ड में अभी भी अरूप विश्वास का नाम अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के रूप में दर्ज बताया जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व और नियंत्रण को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता के कारण उन्होंने यह कदम उठाया ताकि भविष्य में किसी संभावित वित्तीय या कानूनी विवाद से बचा जा सके।

‘असली तृणमूल’ की लड़ाई का नया अध्याय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बैंक खातों को लेकर शुरू हुआ विवाद दरअसल तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही बड़ी राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा है। जिस तरह पार्टी के भीतर अलग-अलग गुट स्वयं को ‘असली तृणमूल’ बताने का दावा कर रहे हैं, उसी तरह अब पार्टी फंड और वित्तीय संपत्तियों पर अधिकार को लेकर भी संघर्ष तेज हो गया है।

लोकसभा में बागी सांसदों के एक समूह से जुड़े नेताओं ने पहले ही संकेत दिए थे कि पार्टी के चुनाव चिह्न और फंड पर नियंत्रण को लेकर कानूनी विवाद सामने आ सकता है। वर्तमान घटनाक्रम को उसी संघर्ष की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

कुणाल घोष ने दिया जवाब

ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले तृणमूल नेता कुणाल घोष ने इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शिकायत करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन पार्टी के अंदर के नेताओं को पहले अपने नेतृत्व से संवाद करना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि जिन विधायकों ने तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर जनता का समर्थन हासिल किया, उन्हें अपनी चिंताओं को पहले पार्टी मंच पर उठाना चाहिए था।

आगे क्या कार्रवाई होगी?

बैंक खातों के डेबिट संचालन पर रोक लगने के बाद अब सबकी नजर इस बात पर है कि जांच एजेंसियां आगे क्या कदम उठाती हैं और पार्टी नेतृत्व इस विवाद से कैसे निपटता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मामला केवल बैंक खातों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, वैधता और संगठनात्मक नियंत्रण की लड़ाई को भी नई दिशा दे सकता है।

फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि 440 करोड़ रुपये वाले इन खातों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है, जिसके दूरगामी राजनीतिक और कानूनी असर देखने को मिल सकते हैं।

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