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लोकसभा अध्यक्ष से मिले अभिषेक, 20 बागी सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग

लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर टिकी निगाहें, अभिषेक ने बढ़ाया बागी सांसदों पर दबाव।

By श्वेता सिंह

Jun 19, 2026 23:45 IST

नई दिल्लीः तृणमूल कांग्रेस ने पार्टी छोड़ने वाले 20 बागी सांसदों के खिलाफ मोर्चा और तेज कर दिया है। राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा में पार्टी के नेता अभिषेक बनर्जी ने शुक्रवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर इन सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की। पार्टी का आरोप है कि बागी सांसदों ने जनादेश और संविधान दोनों की भावना का उल्लंघन किया है। इसी को आधार बनाकर टीएमसी ने उनके खिलाफ 20 अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं भी दाखिल की हैं।

अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी के प्रतिनिधिमंडल ने संसद भवन में लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल में वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी, डेरेक ओ'ब्रायन, महुआ मोइत्रा और सौगत राय भी शामिल थे। नेताओं ने अध्यक्ष के समक्ष विस्तार से अपना पक्ष रखते हुए बागी सांसदों द्वारा किए जा रहे दावों को चुनौती दी।

अलग गुट और विलय के दावे पर उठाए सवाल

टीएमसी का कहना है कि कुछ दिन पहले 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मिलकर खुद को अलग समूह के रूप में मान्यता देने की मांग की थी। इसके बाद उनमें से कुछ सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) नामक संगठन के साथ विलय का दावा कर दिया।

अभिषेक बनर्जी ने कहा कि यह पूरा घटनाक्रम कई सवाल खड़े करता है। उनके अनुसार जिन सांसदों ने जनता के वोट पर जीत हासिल की, वे अब पार्टी छोड़कर नए राजनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं। टीएमसी का दावा है कि यह कदम दल-बदल विरोधी कानून की भावना के खिलाफ है।

स्पीकर के फैसले पर नजर

मुलाकात के बाद अभिषेक बनर्जी ने कहा कि पार्टी ने पूरा मामला लोकसभा अध्यक्ष के सामने रख दिया है। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद निर्णय लेने की बात कही है।

अभिषेक ने कहा कि पार्टी फिलहाल स्पीकर के विवेक और संवैधानिक प्रक्रिया पर भरोसा कर रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि फैसला संविधान के अनुरूप होगा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करेगा।

20 अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दाखिल

टीएमसी ने बागी सांसदों के खिलाफ सामूहिक नहीं बल्कि अलग-अलग 20 अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की हैं। पार्टी का मानना है कि प्रत्येक सांसद का मामला दल-बदल कानून के तहत जांच के दायरे में आता है।

अभिषेक बनर्जी ने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची स्पष्ट रूप से बताती है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को राजनीतिक दल बदलने की स्थिति में किन नियमों का पालन करना होगा। उनके अनुसार बागी सांसदों के कदम उन प्रावधानों के अनुरूप नहीं हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी उठाए सवाल

टीएमसी नेता ने पूरे घटनाक्रम को व्यापक राजनीतिक संदर्भ से जोड़ते हुए आरोप लगाया कि देश में क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि कई राज्यों में राजनीतिक दलों के भीतर टूट-फूट की घटनाएं सामने आई हैं और पश्चिम बंगाल भी इससे अछूता नहीं है।

उन्होंने दावा किया कि लोकतांत्रिक राजनीति में सभी दलों को समान अवसर मिलना चाहिए, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां अलग तस्वीर पेश करती हैं।

जांच एजेंसियों के इस्तेमाल का आरोप

अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया कि राजनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए विभिन्न एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उन्हें खुद कई बार समन भेजे गए और जांच एजेंसियों के समक्ष पेश होना पड़ा।

हालांकि उन्होंने कहा कि इन सबके बावजूद टीएमसी संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा रखती है और कानूनी रास्ते से ही अपनी लड़ाई लड़ रही है।

बागी सांसदों पर तीखा हमला

अभिषेक बनर्जी ने कहा कि पार्टी छोड़ने वाले सांसदों ने जनता के विश्वास को ठेस पहुंचाई है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन नेताओं ने अपने राजनीतिक दायित्वों से मुंह मोड़ लिया है।

उन्होंने कहा कि यदि बागी सांसद अपने फैसले को सही मानते हैं तो उन्हें सांसद पद से इस्तीफा देकर दोबारा जनता के बीच जाना चाहिए और नया जनादेश हासिल करना चाहिए।

दसवीं अनुसूची बनी टीएमसी का आधार

टीएमसी का पूरा मामला संविधान की दसवीं अनुसूची पर आधारित है। पार्टी का तर्क है कि केवल सांसदों का एक समूह अलग होकर किसी नए राजनीतिक मंच का दावा नहीं कर सकता।

वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी ने भी कहा कि किसी राजनीतिक दल का विलय केवल सांसदों की संख्या का मामला नहीं होता, बल्कि इसके लिए संगठनात्मक स्तर पर वैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है।

अब क्या होगा आगे?

20 अयोग्यता याचिकाएं दाखिल होने के बाद अब अगला कदम लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के हाथ में है। यदि इस मामले में औपचारिक सुनवाई शुरू होती है तो बागी सांसदों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। इसके बाद ही अध्यक्ष तय करेंगे कि दल-बदल कानून के तहत आगे क्या कार्रवाई की जानी चाहिए।

राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि यह मामला केवल टीएमसी के आंतरिक विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में दल-बदल विरोधी कानून की व्याख्या और संसदीय परंपराओं पर भी असर डाल सकता है।

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