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Bengal Election: मालदा ‘बंधक’ कांड: चुनावी सरगर्मी के बीच हिंसा से गरमाई बंगाल की राजनीति

न्यायिक अधिकारियों को घंटों बंधक बनाए जाने की घटना पर BJP–TMC में तीखी टकराहट, सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन से मांगा जवाब।

By श्वेता सिंह

Apr 03, 2026 10:55 IST

मालदाः पश्चिम बंगाल की राजनीति को मालदा में 1 अप्रैल को हुई हिंसक घटना ने झकझोर कर रख दिया है। एक गांव में उग्र भीड़ ने सात न्यायिक अधिकारियों को कई घंटों तक बंधक बनाए रखा जिनमें तीन महिला अधिकारी भी शामिल थीं। चुनाव से ठीक पहले हुई इस घटना ने पूरे राज्य को स्तब्ध कर दिया है और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह घटना केवल एक कानून-व्यवस्था का मामला भर नहीं है, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी खड़े करती है। साथ ही, चुनावी माहौल के बीच इस तरह की हिंसा ने राज्य में सुरक्षा, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है।

यह पूरा विवाद मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) के दौरान कथित रूप से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से जुड़ा बताया जा रहा है, जिससे स्थानीय लोगों में आक्रोश फैल गया।

घटना कैसे हुई: आक्रोश से बंधक तक

प्राप्त जानकारी के अनुसार, न्यायिक अधिकारी क्षेत्र में SIR प्रक्रिया से जुड़े मामलों की सुनवाई और सत्यापन कार्य के लिए पहुंचे थे। इसी दौरान ग्रामीणों का एक समूह वहां एकत्र हुआ और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे पर विरोध जताने लगा।

स्थिति जल्द ही नियंत्रण से बाहर हो गई और भीड़ ने अधिकारियों को घेर लिया। आरोप है कि अधिकारियों को कई घंटों तक बाहर निकलने नहीं दिया गया और उन्हें भोजन-पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रखा गया।

यह घटना न केवल प्रशासनिक विफलता को उजागर करती है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में जमीनी स्तर पर बढ़ते तनाव को भी सामने लाती है।

BJP का हमला: “राज्य में कानून-व्यवस्था खत्म”

इस घटना के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेता एवं केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने राज्य सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यह घटना साबित करती है कि राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।

उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी “उकसाने वाली राजनीति” के कारण ऐसी घटनाएं हो रही हैं। उन्होंने चुनाव आयोग से मामले की जांच कराने और यह पता लगाने की मांग की कि जिन लोगों के नाम हटाए गए, वे वास्तव में भारतीय नागरिक हैं या नहीं।

स्मृति ईरानी ने भी TMC पर निशाना साधते हुए कहा कि “भ्रष्टाचार और हिंसा” अब उसकी पहचान बन चुकी है और राज्य को इससे मुक्त कराने के लिए सत्ता परिवर्तन जरूरी है।

भाजपा सांसद रवि किशन ने अपने अनुभव साझा करते हुए दावा किया कि चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिली और BJP कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले होते रहे हैं।

वहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा शर्मा ने इस घटना को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताते हुए कहा कि राज्य में प्रशासनिक संस्थाओं को राजनीतिक नजरिये से देखा जा रहा है, जिससे हालात बिगड़ रहे हैं।

BJP प्रवक्ता गौरव भाटिया ने TMC पर “तुष्टिकरण की राजनीति” करने का आरोप लगाते हुए कहा कि संविधान और न्यायिक संस्थाओं से ऊपर कोई नहीं हो सकता।

TMC का पलटवार: “यह सुनियोजित साजिश”

दूसरी ओर, TMC ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए BJP पर ही माहौल खराब करने का आरोप लगाया।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि BJP का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को बाधित करना है। उन्होंने आरोप लगाया कि “चुनाव रद्द कर बंगाल पर जबरन कब्जा करने की योजना बनाई जा रही है।”

TMC ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के जरिए राज्य प्रशासन में हस्तक्षेप किया जा रहा है और अनुभवी अधिकारियों को हटाकर बाहरी अधिकारियों को तैनात किया गया है, जिन्हें स्थानीय परिस्थितियों की समझ नहीं है।

TMC सांसद कुणाल घोष ने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के कारण जनता में असंतोष है और इस असंतोष को BJP राजनीतिक लाभ के लिए भड़का रही है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: प्रशासन से मांगा जवाब

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और इसे न्यायिक प्रक्रिया में “जानबूझकर बाधा डालने की गंभीर कोशिश” करार दिया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि पूर्व सूचना के बावजूद अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गई, जिससे वे घंटों तक असुरक्षित स्थिति में फंसे रहे।

अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

इसके साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिए कि:

न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त केंद्रीय बल तैनात किए जाएं।

SIR प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा कड़ी की जाए।

अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा का आकलन किया जाए।

अगली सुनवाई में वरिष्ठ अधिकारी वर्चुअली उपस्थित रहें।

चुनाव से पहले बढ़ती हिंसा: बड़ा सवाल

राज्य में 294 सीटों के लिए मतदान 23 और 29 अप्रैल को होना है, जबकि मतगणना 4 मई को होगी।

ऐसे संवेदनशील समय में मालदा की यह घटना चुनावी हिंसा की आशंकाओं को और बढ़ा देती है। 2021 के विधानसभा चुनावों में भी हिंसा के आरोपों के बीच TMC ने 213 सीटों के साथ भारी जीत दर्ज की थी, जबकि BJP 77 सीटों तक पहुंची थी।

लोकतंत्र पर असर: भरोसे की परीक्षा

मालदा की घटना केवल एक स्थानीय विवाद नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास, प्रशासनिक निष्पक्षता और चुनावी सुरक्षा जैसे बड़े सवालों को सामने लाती है।

जहां BJP इसे कानून-व्यवस्था की विफलता और राजनीतिक संरक्षण का परिणाम बता रही है, वहीं TMC इसे विपक्ष द्वारा रची गई साजिश करार दे रही है।

चुनाव नजदीक हैं, और ऐसे में यह घटना यह तय करेगी कि क्या पश्चिम बंगाल शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव की कसौटी पर खरा उतर पाता है या नहीं।

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