नयी दिल्लीः पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। अर्न्स्ट एंड यंग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अगर हालात लंबे समय तक बने रहते हैं तो भारत की आर्थिक वृद्धि दर में करीब 1 प्रतिशत की कमी आ सकती है और महंगाई बढ़ने की आशंका है।
‘इकोनॉमी वॉच’ रिपोर्ट में कहा गया है कि भू-राजनीतिक तनाव का सबसे बड़ा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है। कच्चे तेल की सप्लाई, स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन में बाधा आने से वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों पर पड़ता है।
रिपोर्ट के अनुसार यदि यह स्थिति अगले वित्त वर्ष तक जारी रहती है तो भारत की विकास दर कमजोर हो सकती है। अनुमान है कि वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर में लगभग 1 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है, जबकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई लगभग 1.5 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती के संकेत दिखाई दे रहे हैं। वर्ष 2026 की शुरुआत में कई आर्थिक संकेतक बेहतर प्रदर्शन दिखा रहे थे, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण थोड़ी धीमी पड़ने के संकेत भी मिल रहे हैं।
रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। देश अपनी लगभग 90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत बाहर से पूरी करता है, साथ ही प्राकृतिक गैस और उर्वरकों के लिए भी आयात पर निर्भरता अधिक है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी भी अस्थिरता का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
इसका प्रभाव कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है, खासकर उन उद्योगों पर जो बड़े पैमाने पर रोजगार देते हैं, जैसे वस्त्र, पेंट, रसायन, उर्वरक, सीमेंट और टायर उद्योग। इन क्षेत्रों में उत्पादन लागत बढ़ने और मांग घटने की संभावना जताई गई है।
रिपोर्ट में निजी क्षेत्र की गतिविधियों में शुरुआती सुस्ती के संकेत भी बताए गए हैं। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का पीएमआई पिछले साढ़े चार वर्षों के निचले स्तर पर पहुंच गया है, जबकि इनपुट लागत और बिक्री कीमतों में तेजी से वृद्धि दर्ज की गई है।
इन चुनौतियों को देखते हुए रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सरकार को स्थिति संभालने के लिए नीतिगत कदम उठाने पड़ सकते हैं। इसमें अतिरिक्त राजकोषीय उपाय और संतुलनकारी नीतियां शामिल हो सकती हैं, ताकि वैश्विक अस्थिरता के असर को कम किया जा सके।
इसके बावजूद रिपोर्ट में उम्मीद जताई गई है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना रहेगा, हालांकि यदि वैश्विक तनाव लंबे समय तक जारी रहा तो विकास दर पर दबाव पड़ सकता है।