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“टीमवर्क से ही संभव है अंतरिक्ष की जीत” - शुभांशु शुक्ला ने छात्रों को सुनाया स्पेस सफर का अनुभव

आईएसएस मिशन से लेकर गगनयान तक, अंतरिक्ष यात्री ने बताया चुनौतियों, प्रयोगों और सपनों का सफर।

By श्वेता सिंह

Mar 28, 2026 22:28 IST

तिरुवनंतपुरम: भारत के गगनयान कार्यक्रम के लिए चयनित अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला (Shubhanshu Shukla) ने शनिवार को छात्रों के बीच अपने अंतरिक्ष अनुभव साझा करते हुए कहा कि किसी भी स्पेस मिशन की सफलता का सबसे बड़ा आधार टीमवर्क होता है।

सरकारी मॉडल हाई स्कूल में छात्रों से संवाद करते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की अपनी यात्रा को याद किया और बताया कि अंतरिक्ष अब दूर का सपना नहीं, बल्कि हकीकत बन चुका है।

“अंतरिक्ष में सब कुछ तैरता है”

शुक्ला ने छात्रों को अंतरिक्ष का अनुभव बेहद सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा कि वहां हर चीज तैरती है और जब पृथ्वी को अंतरिक्ष से देखते हैं, तो वह बिल्कुल अपने घर जैसी लगती है। उन्होंने बच्चों को प्रेरित करते हुए कहा, “आसमान अब सीमा नहीं है। अगर मेहनत और लगन हो, तो कोई भी इस मुकाम तक पहुंच सकता है।”

शरीर पर अंतरिक्ष का असर

अपने अनुभव साझा करते हुए शुक्ला ने बताया कि अंतरिक्ष में रहने के दौरान उनके शरीर में कई बदलाव हुए। आईएसएस पर उनकी लंबाई 5 से 6 सेंटीमीटर तक बढ़ गई थी, लेकिन पृथ्वी पर लौटने के बाद गुरुत्वाकर्षण के कारण रीढ़ पर दबाव पड़ा और चलना-फिरना मुश्किल हो गया। उन्होंने कहा कि वापसी के बाद वे एक कदम भी नहीं चल पा रहे थे और पूरी तरह सामान्य होने में करीब आठ दिन लग गए।

रॉकेट लॉन्च का रोमांच

लॉन्च के पल को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जब नौ इंजन एक साथ जलते हैं, तो उसकी ताकत को शब्दों में बयान करना मुश्किल है। 20 साल के उड़ान अनुभव के बावजूद कुछ सेकंड के लिए उनका दिमाग पूरी तरह खाली हो गया था। उन्होंने बताया कि लॉन्च के दौरान शरीर पर इतना दबाव पड़ता है कि छाती पीछे की ओर धकेली जाती है, लेकिन अंतरिक्ष में पहुंचते ही अचानक चारों तरफ शांति छा जाती है।

आईएसएस मिशन और वैज्ञानिक प्रयोग

शुक्ला ने जून-जुलाई 2025 में Axiom-4 Mission के तहत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की 18 दिन की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने करीब 1.2 करोड़ किलोमीटर का सफर तय किया और पृथ्वी के 282 चक्कर लगाए। वे भारत के पहले ऐसे अंतरिक्ष यात्री बने जो आईएसएस तक पहुंचे। इससे पहले राकेश शर्मा (Rakesh Sharma) 1984 में सोवियत स्पेस स्टेशन सल्यूत-7 गए थे।

इस मिशन के दौरान शुक्ला ने सात महत्वपूर्ण भारतीय प्रयोग किए, जिनमें टार्डिग्रेड्स, मायोजेनेसिस, मूंग और मेथी के बीज, सायनोबैक्टीरिया, माइक्रोएल्गी और केरल के पारंपरिक चावल के बीजों पर अध्ययन शामिल था। इन प्रयोगों से माइक्रोग्रेविटी में पौधों के विकास और भविष्य की स्पेस फार्मिंग को लेकर नई जानकारी मिली।

गगनयान के लिए अहम कदम

उन्होंने बताया कि यह मिशन भारत के गगनयान प्रोग्राम के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ है। आने वाले समय में 2026 में तीन बिना मानव वाली उड़ानें प्रस्तावित हैं, जबकि 2027 में भारत का पहला मानवयुक्त मिशन लॉन्च होने की संभावना है।

इस कार्यक्रम के लिए भारतीय वायुसेना के चार पायलट चुने गए हैं, जिनमें शुक्ला के साथ प्रशांत नायर, अजित कृष्णन और अंगद प्रताप शामिल हैं।

युवाओं के लिए संदेश

शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष में भारत का प्रतिनिधित्व करना उनके लिए गर्व की बात है। अब उनका उद्देश्य है कि देश के ज्यादा से ज्यादा युवा विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में आगे आएं। उन्होंने कहा कि उनका मकसद मिशन की जटिलताओं को समझाना और नई पीढ़ी को चुनौतीपूर्ण करियर अपनाने के लिए प्रेरित करना है।

शुभांशु शुक्ला की यह यात्रा सिर्फ एक अंतरिक्ष मिशन नहीं, बल्कि देश के युवाओं के लिए प्रेरणा की कहानी है। उनका संदेश साफ है-अगर टीमवर्क, मेहनत और सपने साथ हों, तो अंतरिक्ष भी दूर नहीं।

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