प्राकृतिक झीलों की संख्या थी 697। वर्ष 1967 में कश्मीर के भू-वैज्ञानिक विशेषताओं के बारे में सरकारी दस्तावेजों में यही रिपोर्ट दर्ज थी लेकिन पिछले 60 सालों में इसमें बड़ा बदलाव आया है। हाल ही में सामने आयी देश की कॉम्प्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) की रिपोर्ट से यह पता चलता है कि ‘धरती के स्वर्ग’ अब प्राकृतिक झीलों की संख्या घटकर महज 282 रह गयी है। 315 प्राकृतिक झीलों का नामों निशान तक मिट चुका है।
ऑडिट की रिपोर्ट के मुताबिक, सभी प्राकृतिक झीलों में से 518 झीलों की स्थिति भी गंभीर रूप से संकटजनक है जिसमें से 315 की तो 'मौत' ही हो चुकी है। भू-वैज्ञानिकों ने बताया कि प्रशासनिक और नागरिक - दोनों स्तरों पर ही उपेक्षा, अतिक्रमण और समन्वय की कमी के कारण राज्य के कम से कम 3000 हेक्टेयर जलक्षेत्र नष्ट हो चुके हैं।
कश्मीर के पर्यटन मानचित्र पर अगर नजर डालें तो ऐसे कुल 6 झीलों के नाम मिलते हैं, जो सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया भर के पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। इनमें श्रीनगर की डल झील (Dal Lake) शामिल है, जो हाउसबोट और शिकारा के लिए जानी जाती है।
इसके साथ ही देश की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील वुलर झील, कश्मीर की सबसे गहरी मानसबल झील, माउंट हरमुख की घाटी में स्थित गंगाबल झील, कश्मीर के प्रसिद्ध ‘लेक ट्रेक’ मार्ग पर स्थित विशानर झील और ‘मछलियों की झील’ के नाम से प्रसिद्ध गदसर झील। भू-वैज्ञानिकों का मानना है ये 6 झील भी अब पूरी तरह सुरक्षित स्थिति में नहीं है।
CAG की वर्ष 2017–18 से 2021–22 के बीच की रिपोर्ट में कश्मीर की झीलों की स्थिति चिंताजनक बतायी गयी है। रिपोर्ट के आधार पर कहा गया है कि वर्ष 1967 में दर्ज 697 झीलों में से 315 झीलें पूरी तरह से खत्म हो चुकी हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 1,537 हेक्टेयर था। इसके अलावा, 203 झीलों के आकार में कमी आई है, जिससे कुल 1,314 हेक्टेयर जल क्षेत्र का नुकसान हुआ है।
इस प्रकार, कुल 518 विलुप्त और क्षतिग्रस्त झीलों का क्षेत्रफल मिलाकर 2,851 हेक्टेयर कम हो गया है।
रिपोर्ट के अनुसार झीलों के स्वास्थ्य में इस तरह की गिरावट से जैव विविधता, पारिस्थितिकी तंत्र और झीलों से मिलने वाली विभिन्न सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जांच की गई झीलों में से 150 झीलों का क्षेत्रफल कुछ हद तक बढ़ा है, जबकि 29 झीलों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।
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कश्मीर तथा गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र में हिमालय की भू-वैज्ञानिक स्थिति पर शोध करने वाली संस्था वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (Wadia Institute of Himalayan Geology) के वैज्ञानिकों ने ऑडिट रिपोर्ट के एक अहम पहलू पर जोर दिया है।
ऑडिट में बताया गया है कि कश्मीर घाटी की 63 झीलें अपने जल क्षेत्र का आधे से अधिक हिस्सा खो चुकी हैं, जिसके कारण इनके पूरी तरह विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है।
शोधकर्ताओं के अनुसार अधिकांश झीलें कई सरकारी विभागों—वन, भूमि एवं राजस्व, और कृषि विभाग—के अधीन आती हैं। जो 315 झीलें पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं उनमें से लगभग तीन-चौथाई भूमि एवं राजस्व और कृषि विभाग के अधिकार क्षेत्र में थीं जबकि बाकी वन विभाग के अंतर्गत थीं।
विशेषज्ञों का आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर कमजोर समन्वय, अव्यवस्थित योजना और संरक्षण कार्यों को केवल 6 झीलों तक सीमित रखने के कारण अन्य झीलें असुरक्षित रह गईं। दावा किया जा रहा है कि इसी वजह से पूरे क्षेत्र की जैव विविधता गंभीर संकट में पड़ गई है।
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इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन 6 झीलों में कुछ हद तक संरक्षण कार्य चल रहा है, उनमें शामिल हैं - डल झील, वुलर झील, होकेरसर, मानसबल झील, सुरीनसर झील और मानसर झील। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कश्मीर की लोकप्रिय झीलों में शामिल गंगाबल झील, विन्सर झील और गदसर झील को अब तक संरक्षण के दायरे में शामिल ही नहीं किया गया है।
वर्ष 2017 से 2022 के बीच जम्मू-कश्मीर के बजट का महज 1 प्रतिशत - यानी कुल ₹561 करोड़ ही इन 6 झीलों के संरक्षण के लिए आवंटित किया गया था। लेकिन इस धन के उपयोग में भी जलधारण क्षमता की निगरानी, जैव विविधता का आकलन, प्रदूषण नियंत्रण, खरपतवार हटाने, गाद निकालने और जन-जागरूकता बढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
इन्हीं कारणों से कश्मीर घाटी की लगभग सभी झीलों का भविष्य अब असुरक्षित माना जा रहा है।