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चोल ताम्रपत्रों की घर वापसी, नीदरलैंड्स ने भारत को लौटाई धरोहर

2012 से चल रही थी मांग, 21 बड़े और 3 छोटे ताम्रपत्र भारत को सौंपे गए।

By श्वेता सिंह

May 16, 2026 22:51 IST

द हेगः नीदरलैंड्स के द हेग में 11वीं सदी के चोल वंश से जुड़े ऐतिहासिक ताम्रपत्र भारत को वापस सौंप दिए गए। यह औपचारिक हस्तांतरण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में हुआ। इस मौके को भारत की सांस्कृतिक विरासत की “घर वापसी” के रूप में देखा जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने इसे हर भारतीय के लिए खुशी का पल बताया और कहा कि ये ताम्रपत्र भारत के गौरवशाली इतिहास और चोल सभ्यता की समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं। उन्होंने नीदरलैंड्स सरकार और लीडेन विश्वविद्यालय का भी धन्यवाद किया, जहां ये दस्तावेज लंबे समय तक सुरक्षित रखे गए थे।

लंबी कोशिशों के बाद मिली सफलता

भारत सरकार इन ताम्रपत्रों को वापस लाने के लिए 2012 से प्रयास कर रही थी। इन्हें नीदरलैंड्स में ‘लीडेन प्लेट्स’ कहा जाता था, जबकि भारत में इनका नाम ‘अनैमंगलम ताम्रपत्र’ है।

ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, 18वीं सदी में फ्लोरेंटियस कैम्पर इन्हें भारत से नीदरलैंड्स ले गए थे, जब नागपट्टिनम क्षेत्र डच शासन के अधीन था। बाद में ये ताम्रपत्र लीडेन विश्वविद्यालय में रखे गए, जहां इन पर शोध भी होता रहा।

चोल काल की शासन व्यवस्था और इतिहास का प्रमाण

यह संग्रह कुल 21 बड़े और 3 छोटे ताम्रपत्रों का है। इनमें तमिल और संस्कृत भाषा में लेख लिखे हुए हैं।

इन ताम्रपत्रों में चोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम के आदेश दर्ज हैं, जिन्हें उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने तांबे की प्लेटों पर लिखवाया था ताकि वे लंबे समय तक सुरक्षित रहें।

इनमें नागपट्टिनम के बौद्ध विहार ‘चूलामणिवर्म विहार’ को अनैमंगलम गांव दान देने का भी उल्लेख मिलता है। यह उस समय की भूमि व्यवस्था और प्रशासनिक प्रणाली को दर्शाता है।

लगभग 30 किलोग्राम वजन वाले इन ताम्रपत्रों को कांस्य रिंग में जोड़ा गया है, जिस पर चोल राजवंश की मुहर लगी हुई है।

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धार्मिक सौहार्द और सामाजिक समरसता का संदेश

इतिहासकारों के अनुसार, ये ताम्रपत्र सिर्फ प्रशासनिक दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि उस समय के समाज की सोच को भी दिखाते हैं। इनमें यह साफ होता है कि चोल काल में विभिन्न धर्मों के बीच सहयोग और सम्मान का वातावरण था।

बौद्ध विहार को भूमि दान देने का उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि उस समय धार्मिक सह-अस्तित्व और सामाजिक समरसता मौजूद थी।

भारत की सांस्कृतिक पहचान को मिली मजबूती

विशेषज्ञ मानते हैं कि ये ताम्रपत्र भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच पुराने व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी उजागर करते हैं।

अंतर-सरकारी समिति ने पहले ही भारत के दावे को सही माना था और नीदरलैंड्स से इस विषय पर बातचीत जारी रखने की सिफारिश की थी। इसके बाद दोनों देशों की सहमति से प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान इन्हें भारत को सौंप दिया गया।

विदेश मंत्रालय ने इसे भारत की सांस्कृतिक विरासत की महत्वपूर्ण वापसी बताया है, जिससे आने वाले समय में भारत और अन्य देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग और मजबूत होने की उम्मीद है।

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