बीजिंगः पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच घोषित युद्धविराम पाकिस्तान के आग्रह पर स्वीकार किया गया था। उनके अनुसार इस कदम का उद्देश्य क्षेत्रीय संघर्ष को रोकते हुए व्यापक कूटनीतिक समाधान की दिशा में बातचीत का रास्ता खोलना था। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि कई अन्य देशों ने भी अमेरिका से संघर्ष विराम लागू करने की अपील की थी।
चीन की दो दिवसीय महत्वपूर्ण यात्रा पूरी करने के बाद बीजिंग से एंकोरेज जाते समय एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से युद्धविराम के पक्ष में नहीं थे, लेकिन पाकिस्तान के अनुरोध पर यह फैसला लिया गया। उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व और सरकार की सराहना करते हुए कहा कि वहां के फील्ड मार्शल और प्रधानमंत्री ने मध्यस्थता में सक्रिय भूमिका निभाई। ट्रंप ने यह भी कहा कि उनकी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की कई मुद्दों पर समान राय है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने चीन से ईरान पर दबाव बनाने के लिए कोई विशेष मदद नहीं मांगी। यदि किसी देश से एहसान लिया जाता है तो बदले में कुछ देना भी पड़ता है, जबकि अमेरिका को किसी सहायता की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने दावा किया कि ईरान की सैन्य क्षमता को लगभग पूरी तरह कमजोर कर दिया गया है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि एक महीने के संघर्ष विराम के बाद कुछ सीमित सैन्य कार्रवाई या “सफाई अभियान” की आवश्यकता पड़ सकती है।
ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका द्वारा लगाया गया समुद्री अवरोध बेहद प्रभावी साबित हुआ है और उसी रणनीतिक स्थिति के कारण युद्धविराम लागू किया गया। उनका संकेत होर्मुज़ जलडमरूमध्य की ओर था, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है।
बाद में ट्रंप ने यह संभावना भी जताई कि चीन ईरान पर दबाव डालने में भूमिका निभा सकता है ताकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोला जा सके। उन्होंने कहा कि चीन की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से आने वाले तेल पर निर्भर करता है। ट्रंप के मुताबिक चीन अपनी ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्वयं चाहेगा कि यह मार्ग बिना बाधा के चालू रहे।
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम की घोषणा सात अप्रैल को की गई थी। इससे पहले 28 फरवरी को अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर संयुक्त सैन्य हमले किए गए थे, जिसके बाद पूरे क्षेत्र में लगभग एक महीने तक तनाव और टकराव की स्थिति बनी रही।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान लगातार वॉशिंगटन और तेहरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रयास कर रहा है। उसका दावा है कि वह दोनों देशों के बीच स्थायी समाधान निकालने की दिशा में काम कर रहा है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन के भीतर पाकिस्तान की भूमिका को लेकर संदेह भी बढ़ता दिखाई दे रहा है।
अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ट्रंप प्रशासन के कुछ करीबी अधिकारियों को आशंका है कि पाकिस्तान दोनों पक्षों के साथ अलग-अलग तरह का व्यवहार कर रहा है। एक ओर वह खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान के रुख को अमेरिका के सामने वास्तविक स्थिति से अधिक सकारात्मक रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
सीएनएन की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी प्रशासन यह जांच रहा है कि क्या पाकिस्तान ने शांति प्रक्रिया को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप की नाराज़गी को सही तरीके से तेहरान तक पहुंचाया भी था या नहीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ अधिकारियों का मानना है कि पाकिस्तान ने ईरान की प्रतिक्रिया को वास्तविकता से अलग तरीके से पेश किया, जिससे अमेरिका के भीतर अविश्वास की स्थिति बनी।