🔔 ताज़ा ख़बरें सबसे पहले!

Samachar EiSamay की ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, खेल, मनोरंजन और बिज़नेस अपडेट अब सीधे आपके पास।

पीएम मोदी का यूएई दौरा: भारत की ऊर्जा सुरक्षा और तेल संकट पर बड़ी कूटनीतिक पहल

हॉर्मुज जलडमरूमध्य संकट के बीच भारत की वैकल्पिक आपूर्ति रणनीति पर फोकस

अबू धाबी : प्रधानमंत्री मोदी के यूएई दौरे से भारत को तेल संकट से राहत की उम्मीद, ज्वलनशील वैश्विक हालात के बीच अहम कूटनीतिक पहल,वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अस्थिरता के बीच 15 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की आधिकारिक यात्रा पर रवाना हो रहे हैं। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों के कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर गंभीर चिंताए बनी हुई हैं। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक आयात के माध्यम से पूरा करता है ऐसे में आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार की बाधा का सीधा असर पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों, महंगाई और चालू खाते के घाटे पर पड़ सकता है।

इस महत्वपूर्ण यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अबू धाबी में यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात करेंगे। माना जा रहा है कि इस बैठक में ऊर्जा सुरक्षा सबसे प्रमुख मुद्दा रहेगा। दोनों नेताओं के बीच स्पॉट मार्केट से तात्कालिक तेल खरीद, दीर्घकालिक कच्चे तेल और एलएनजी आपूर्ति समझौते तथा भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार के विस्तार में यूएई की भागीदारी जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है।

भारत वर्तमान में अपने रणनीतिक तेल भंडार के माध्यम से ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। देश के पास तीन रणनीतिक तेल भंडार हैं जिनकी कुल क्षमता 53.3 लाख मीट्रिक टन है जबकि दो अतिरिक्त भंडार स्थापित करने की योजना पर भी काम चल रहा है, जिससे लगभग 65 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त भंडारण क्षमता जोड़ी जा सकेगी। मौजूदा ढांचे का एक हिस्सा पहले से ही अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (एडीएनओसी) को लीज पर दिया गया है और इस मॉडल के और विस्तार की संभावना जताई जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस दौरे में कुछ प्रमुख बिंदुओं पर विशेष जोर दे सकता है, जिनमें दीर्घकालिक कच्चे तेल आपूर्ति की गारंटी, घरेलू ऊर्जा सुरक्षा के लिए अधिक एलएनजी आपूर्ति, रणनीतिक तेल भंडार में यूएई की भागीदारी और समुद्री मार्गों में व्यवधान की स्थिति में वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था शामिल है। हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात के ओपेक (ओर्गेनाइज़ेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज) से बाहर निकलने के बाद उसकी उत्पादन क्षमता और रणनीतिक स्वतंत्रता में वृद्धि हुई है, जिससे उसे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अधिक लचीला आपूर्तिकर्ता माना जा रहा है।

भारत और यूएई के बीच ऊर्जा सहयोग पहले से ही मजबूत होता जा रहा है। जनवरी में दोनों देशों के बीच लगभग 300 करोड़ डॉलर का एलएनजी समझौता हुआ था, जिसे इस यात्रा में और आगे बढ़ाए जाने की संभावना है। इसके अलावा वर्ष 2022 में हस्ताक्षरित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) के बाद दोनों देशों के व्यापार संबंध तेजी से विस्तार कर रहे हैं और आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को 20,000 करोड़ डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।

इस यात्रा के दौरान सीईपीए समझौते की प्रगति की समीक्षा भी की जा सकती है, साथ ही बुनियादी ढांचा निवेश, स्वच्छ ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स, खाद्य आपूर्ति गलियारे, रक्षा सहयोग और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा होने की संभावना है। यूएई के बीच संबंध अब केवल तेल व्यापार तक सीमित नहीं रह गए है बल्कि यह एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी का रूप ले चुके हैं जिसमें ऊर्जा, निवेश और व्यापार के कई आयाम शामिल हैं। भारत के लिए यूएई एक महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्तिकर्ता और निवेश भागीदार बनकर उभरा है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ती वैश्विक चिंता भी इस बैठक का एक महत्वपूर्ण संदर्भ है। भारत के तेल और गैस आयात का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। यदि इस मार्ग में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है, तो जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ेगा, जिससे परिवहन और बीमा लागत बढ़ेगी, आपूर्ति में देरी होगी और देश में ईधन की कीमतों पर तत्काल दबाव बनेगा। इसके अलावा यूएई में रह रहे 45 लाख से अधिक भारतीय प्रवासी भी इस संबंध का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे न केवल विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देते हैं, बल्कि बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी भारत भेजते है जिससे देश की आर्थिक स्थिति को मजबूती मिलती है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया में तनाव वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रहा है। पिछले पांच महीनों में यह दोनों नेताओं के बीच दूसरी प्रत्यक्ष बैठक होगी, जो इस साझेदारी के बढ़ते महत्व को दर्शाता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यूएई के साथ ऊर्जा और निवेश सहयोग को और मजबूत करने से भारत को भविष्य में संभावित तेल संकटों से बेहतर सुरक्षा मिल सकती है और आर्थिक स्थिरता को मजबूती मिलेगी।

Articles you may like: