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शी जिनपिंग ने ताइवान पर दोहराया सख्त रुख, ट्रंप ने दिया व्हाइट हाउस आने का न्योता

ईरान युद्ध, ऊर्जा संकट और रेयर अर्थ मिनरल्स पर बीजिंग बैठक में बनी नई रणनीति

बीजिंग : लगभग एक दशक बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने बीजिंग की धरती पर कदम रखा। इसी वजह से ‘द ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल’ में आयोजित राजकीय रात्रिभोज में ‘बीजिंग रोस्ट डक’, ‘बीफ रिब्स’, ‘पोर्क बन्स’ और ‘तिरामिसू’ जैसे विशेष व्यंजनों के साथ चर्चा का एजेंडा भी बेहद विस्तृत रहा। वार्ता में द्विपक्षीय व्यापार विस्तार, आयात शुल्क और निर्यात नियंत्रण पर समझौते, रेयर अर्थ मिनरल और मैग्नेट पर चीन की नीति, तेजी से बढ़ती एआई तकनीक पर नियंत्रण, रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक ऊर्जा संकट तथा कई अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई।

बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने सार्वजनिक रूप से शिष्टाचार बनाए रखा लेकिन भीतर ही भीतर अपने-अपने रणनीतिक हितों को मजबूत करने की कोशिश भी जारी रखी। ‘ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल’ में आयोजित भोज में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि “चीन के पुनर्जागरण और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ विजन को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सकता है।” इसके जवाब में ट्रंप ने शी जिनपिंग को “महान नेता” बताया और आगामी 24 सितंबर को व्हाइट हाउस आने का औपचारिक निमंत्रण दिया।

बैठक के बाद व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में दावा किया गया कि दोनों देशों ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को खुला रखने पर सैद्धांतिक सहमति जताई है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा कि बीजिंग ने इस मार्ग को खुला बनाए रखने में हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया है। साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया कि वह जल्द ही ताइवान को लेकर अपनी नीति स्पष्ट करेंगे। हालांकि चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने दावा किया कि बैठक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम या हॉर्मुज जलडमरूमध्य का कोई प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं हुआ। उनके अनुसार चर्चा केवल पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति तक सीमित रही।

लेकिन चीन आखिर अमेरिका से क्या चाहता है इसका स्पष्ट संकेत राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बेहद सीधे शब्दों में दिया। उन्होंने ताइवान की स्वतंत्रता के खिलाफ चीन की स्थिति दोहराते हुए कहा कि इस मुद्दे पर बीजिंग और वॉशिंगटन के बीच मतभेद द्विपक्षीय संबंधों को खतरनाक दिशा में ले जा सकते हैं। शी जिनपिंग ने कहा ताइवान की स्वतंत्रता और ताइवान जलडमरूमध्य में शांति, आग और पानी की तरह हैं—दोनों कभी साथ नहीं रह सकते। उन्होंने यह भी कहा कि ताइवान चीन का अविभाज्य हिस्सा है और इस ऐतिहासिक तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर देखते हुए उन्होंने सख्त संदेश दिया ताइवान कभी स्वतंत्र देश नहीं था और भविष्य में भी नहीं होगा। ताइवान के नेता लाई चिंग-ते चाहे जितनी बार अलग पहचान का दावा करें, झूठ को हजार बार दोहराने से वह सच नहीं बन जाता।

इसके बावजूद अमेरिका के साथ संबंधों को लेकर शी जिनपिंग ने नरम लहजे में सहयोग का संदेश भी दिया। उनका कहना था हमारे बीच कुछ मतभेद अवश्य है लेकिन पूरी दुनिया के व्यापक हितों के लिए हमारे संबंधों का मजबूत रहना अधिक आवश्यक है। सहयोग से दोनों देशों को लाभ होगा जबकि टकराव दोनों के लिए नुकसानदायक साबित होगा। हालांकि शी जिनपिंग के इस तीखे लेकिन संतुलित रुख के सामने बैठक के शुरुआती दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति अपेक्षाकृत दबाव में दिखाई दिए। ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों के इतिहास में इससे अधिक महत्वपूर्ण शिखर बैठक पहले कभी नहीं हुई और वह इसकी सफलता को लेकर बेहद आशावादी हैं।

राष्ट्रपति को अपना “मित्र” बताते हुए ट्रंप ने कहा कि “चीन और अमेरिका के संबंध भविष्य में पहले से कहीं अधिक मजबूत और सकारात्मक होंगे।” ट्रंप प्रशासन पहले ही संकेत दे चुका है कि वह ताइवान को चीन से ऊपर प्राथमिकता नहीं देगा। बैठक शुरू होने से लगभग एक महीने पहले ही यह जानकारी सामने आई थी कि ताइवान को प्रस्तावित 14 अरब डॉलर का हथियार पैकेज फिलहाल स्थगित रखा गया है ताकि बीजिंग नाराज न हो। इसी कारण कई विशेषज्ञ शुरुआती दौर में “एडवांटेज बीजिंग” मान रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिका पहले ही अरबों डॉलर खर्च कर चुका है और यदि हॉर्मुज़ संकट लंबे समय तक जारी रहा तो ट्रंप को घरेलू मोर्चे पर गंभीर आर्थिक सवालों का सामना करना पड़ सकता है। अप्रैल में अमेरिका में खुदरा महंगाई दर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। इसके साथ घरेलू ऊर्जा कीमतें बढ़ाने के बावजूद हालात काबू में नहीं आ रहे। ऐसे में ट्रंप की कोशिश होगी कि चीन को अपने पक्ष में किया जाए।

दूसरी ओर अमेरिकी नौसैनिक दबाव के कारण तेहरान की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हुई है। चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। यदि बीजिंग ट्रंप के साथ खड़ा होता है तो ईरान की ओर से हॉर्मुज को अवरुद्ध करने की रणनीति कमजोर पड़ सकती है। इससे चीन को भी ऊर्जा आपूर्ति में फायदा होगा क्योंकि उसकी लगभग 40 प्रतिशत वार्षिक ऊर्जा आयात इसी समुद्री मार्ग से होती है।

पिछले वर्ष अक्टूबर में दक्षिण कोरिया में हुई बैठक के दौरान शी जिनपिंग ने चीन के विशाल क्रिटिकल मिनरल भंडार को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर ट्रंप पर बढ़त बना ली थी और एक वर्ष के लिए “व्यापार युद्ध” को रोकने में सफलता हासिल की थी। इस बार भी माना जा रहा है कि चीन के हाथ में सबसे बड़ा दांव ईरान-अमेरिका तनाव ही है। अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि इस उच्चस्तरीय वार्ता के अंत में वास्तविक राजनीतिक लाभ किसके हिस्से आता है।

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