अयोध्याः अयोध्या स्थित अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय ने रामायण से जुड़ी एक दुर्लभ ऐतिहासिक धरोहर को अपने संग्रह में शामिल करने का निर्णय लिया है। तुलसीदास कृत रामायण (रामचरितमानस) की 250 वर्ष से अधिक पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपि अब संग्रहालय में संरक्षित की जाएगी और भविष्य में आम लोगों के लिए प्रदर्शित भी की जाएगी। इस प्रस्ताव को संग्रहालय की स्क्रीनिंग समिति ने मंजूरी दी, जिसकी अध्यक्षता नृपेन्द्र मिश्रा ने की।
क्षतिग्रस्त होने के बावजूद अमूल्य मानी गई पांडुलिपि
अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय के निदेशक संजीव कुमार सिंह ने बताया कि पांडुलिपि कई स्थानों पर फटी हुई है और दीमकों से भी प्रभावित हुई है। इसके बावजूद इसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्ता इतनी अधिक है कि इसे संग्रहालय के ‘रामायण पांडुलिपि संग्रह यज्ञ’ का हिस्सा बनाने का फैसला लिया गया। उनके अनुसार, इस दुर्लभ दस्तावेज के जुड़ने से संग्रहालय का संग्रह और अधिक समृद्ध तथा शोधपरक बनेगा।
तीन विशेषताओं ने बढ़ाया महत्व
संजीव कुमार सिंह ने बताया कि इस पांडुलिपि की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आयु, भाषा-शैली और लेखन-कला है। विशेषज्ञों के आकलन और उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी के आधार पर माना जा रहा है कि यह पांडुलिपि लगभग 270 से 275 वर्ष पुरानी है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन धरोहरों का महत्व केवल उनके विषयवस्तु तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे उस दौर की सांस्कृतिक और तकनीकी समझ का भी परिचय कराती हैं।
650 पृष्ठों में सहेजा गया इतिहास
यह पांडुलिपि लगभग 650 पृष्ठों की है और बेहद कलात्मक ढंग से तैयार की गई है। इसमें लाल और काली स्याही का आकर्षक संयोजन देखने को मिलता है, जो उस समय की लेखन परंपरा और सौंदर्यबोध को दर्शाता है।
संग्रहालय प्रशासन का मानना है कि यह केवल रामकथा का दस्तावेज नहीं, बल्कि उस युग में प्रयुक्त कागज, स्याही और लेखन तकनीक का भी महत्वपूर्ण प्रमाण है।
1768 के आसपास लिखी गई थी यह प्रति
लखनऊ स्थित ‘चंबल आर्काइव्स’ से जुड़े पांडुलिपि संग्राहक माधवेंद्र पोरवाल ने बताया कि यह हस्तलिखित रामायण लगभग 1768 ईस्वी की मानी जाती है। इसे उस समय प्रचलित हस्तनिर्मित कागज पर संस्कृत शैली में लिखा गया था।
उन्होंने बताया कि पांडुलिपि में 600 से 700 पृष्ठ हैं और इसमें कई ऐसे पाठ एवं विवरण दर्ज हैं जो सामान्य संस्करणों में नहीं मिलते। कुछ चर्चित पंक्तियां भी यहां अलग रूप में लिखी गई हैं, जिससे इसका शोध महत्व और बढ़ जाता है।
हर अध्याय के अंत में दर्ज है लेखन की तिथि
माधवेंद्र पोरवाल के अनुसार, उस समय किसी ग्रंथ को हाथ से लिखने में डेढ़ से दो महीने तक का समय लग जाता था। इस पांडुलिपि के लेखक ने प्रत्येक अध्याय के अंत में उसके पूर्ण होने की तिथि दर्ज की है, जिससे इसके ऐतिहासिक अध्ययन में मदद मिलती है।
विशेषज्ञों ने भी इस पांडुलिपि में कई दुर्लभ जानकारियों और विशिष्ट विवरणों की मौजूदगी की पुष्टि की है।
परिवार के पास हैं रामायण के 41 अन्य संस्करण
माधवेंद्र पोरवाल ने बताया कि यह पांडुलिपि उनके परिवार के पास उनकी दादी के समय से सुरक्षित है। उनके संग्रह में रामायण के 41 अन्य संस्करणों के अलावा कई प्राचीन ग्रंथ भी मौजूद हैं। इन्हीं धरोहरों के संरक्षण के उद्देश्य से उन्होंने एक आर्काइव की स्थापना की है। उन्होंने कहा कि उनकी संस्था न केवल प्राचीन दस्तावेजों का संरक्षण और पुनर्स्थापन करती है, बल्कि भविष्य में इन्हें डिजिटल रूप में निःशुल्क उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पांडुलिपि धार्मिक आस्था, साहित्यिक अध्ययन और ऐतिहासिक शोध—तीनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अयोध्या के रामकथा संग्रहालय में इसके संरक्षण से आने वाली पीढ़ियों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत के एक दुर्लभ अध्याय से परिचित होने का अवसर मिलेगा।