नयी दिल्लीः विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर भारत की पर्यावरणीय उपलब्धियां एक बार फिर चर्चा के केंद्र में रहीं। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने पिछले एक दशक में पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में हुए बदलावों और सरकार की प्रमुख पहलों को सामने रखते हुए बताया कि देश ने प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है।
पर्यावरण संरक्षण को केवल वन और वन्यजीवों तक सीमित रखने के बजाय सरकार ने इसे विकास, ऊर्जा, जल संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन और जनभागीदारी से जोड़ने की रणनीति अपनाई है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में कई नई योजनाओं और कार्यक्रमों को जमीन पर उतारा गया है।
झीलों के संरक्षण में ऐतिहासिक विस्तार
भारत ने आर्द्रभूमियों के संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। वर्ष 2014 में जहां देश में केवल 24 रामसर साइट्स थीं, वहीं अब उनकी संख्या बढ़कर 100 हो गई है। रामसर साइट्स अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियां होती हैं, जो जल संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यह वृद्धि केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन और जल संकट जैसी चुनौतियों के बीच प्राकृतिक जल स्रोतों को सुरक्षित रखने की दिशा में बड़ा कदम है। इससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
संरक्षित क्षेत्रों का बढ़ा दायरा, वन्यजीवों को मिला सुरक्षित आवास
सरकार ने पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया है। वर्ष 2014 तक केवल 24 इको-सेंसिटिव जोन और संरक्षित वन क्षेत्रों को अधिसूचित किया गया था, जबकि अब इनकी संख्या बढ़कर लगभग 380 तक पहुंच गई है।
भूपेंद्र यादव के अनुसार संरक्षित क्षेत्रों के विस्तार का उद्देश्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित करना और विकास गतिविधियों तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना है।
इसी दिशा में देश में टाइगर रिजर्व की संख्या 48 से बढ़कर 58 हो गई है। इसके अलावा प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट लायन, प्रोजेक्ट चीता, प्रोजेक्ट घड़ियाल और प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसी योजनाओं के माध्यम से संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण को नई गति दी गई है।
जैव विविधता से लेकर अरावली और समुद्री तटों तक व्यापक पहल
सरकार ने जैव विविधता संरक्षण को मजबूत करने के लिए जैव विविधता अधिनियम में संशोधन किया है। इसके तहत देश के प्रत्येक गांव में जैव विविधता रजिस्टर तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे स्थानीय स्तर पर मौजूद वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
इसके साथ ही समुद्री तटों पर बढ़ते कटाव और पर्यावरणीय क्षरण से निपटने के लिए ‘मिश्टी’ मैंग्रोव परियोजना शुरू की गई है। मैंग्रोव वनस्पतियां समुद्री तटों को प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती हैं और जैव विविधता के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
वहीं देश की प्राचीन अरावली पर्वतमाला के संरक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम चलाया जा रहा है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और खनन गतिविधियों के बीच अरावली क्षेत्र की सुरक्षा को पर्यावरणीय दृष्टि से अहम माना जा रहा है।
सर्कुलर इकोनॉमी और स्वच्छ ऊर्जा पर बढ़ा फोकस
भूपेंद्र यादव ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण को आर्थिक विकास के साथ जोड़ने के लिए सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत प्लास्टिक, रबर, इस्तेमाल किए गए तेल और महत्वपूर्ण खनिजों के पुनर्चक्रण से जुड़े नियमों को मजबूत किया गया है।
सरकार स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में भी तेजी से निवेश कर रही है। सौर ऊर्जा क्षमता बढ़ाने, गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा स्रोतों को विस्तार देने और उद्योगों को पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप विकसित करने की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत की ऊर्जा नीति अब आर्थिक विकास और कार्बन उत्सर्जन में कमी, दोनों उद्देश्यों को साथ लेकर आगे बढ़ रही है।
मिशन लाइफ: पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाने की कोशिश
पर्यावरणीय पहलों में सबसे महत्वपूर्ण पहल ‘मिशन लाइफ’ को माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस पहल को आगे बढ़ाने में भूपेंद्र यादव की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इस मिशन के सात प्रमुख आयाम हैं-जल बचाओ, भोजन बचाओ, ऊर्जा बचाओ, सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, स्वस्थ जीवनशैली और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देना।
सरकार का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल नीतियों और कानूनों के माध्यम से संभव नहीं है। इसके लिए आम नागरिकों की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। इसी सोच के तहत ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान चलाया जा रहा है, जिसके माध्यम से लोगों को वृक्षारोपण के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
क्या भारत हरित विकास के नए मॉडल की ओर बढ़ रहा है?
पिछले कुछ वर्षों में भारत की पर्यावरण नीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां फोकस मुख्य रूप से वन संरक्षण तक सीमित था, वहीं अब नीति का दायरा जल संरक्षण, जैव विविधता, स्वच्छ ऊर्जा, कचरा प्रबंधन और जनभागीदारी तक फैल चुका है।
भूपेंद्र यादव द्वारा प्रस्तुत उपलब्धियां यह संकेत देती हैं कि सरकार पर्यावरण संरक्षण को विकास की प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि इन पहलों की वास्तविक सफलता उनके प्रभावी क्रियान्वयन और दीर्घकालिक परिणामों पर निर्भर करेगी, लेकिन इतना स्पष्ट है कि भारत ने हरित विकास की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।