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जर्जर घर में सिमटी जिंदगी, दिव्यांग बेटे और मां के लिए सुप्रीम कोर्ट बना सहारा

ओडिशा सरकार को सभी सामाजिक सुरक्षा लाभ देने का निर्देश, दिव्यांग युवक को पैरालीगल वॉलंटियर बनाने का भी आदेश।

By श्वेता सिंह

Jun 16, 2026 18:24 IST

नई दिल्लीः ओडिशा के एक गांव में बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन बिता रहे एक दिव्यांग युवक और उसकी बुजुर्ग मां की कहानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची तो शीर्ष अदालत ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए राज्य सरकार को व्यापक राहत उपाय सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि किसी भी कल्याणकारी राज्य की असली पहचान इस बात से होती है कि उसके सबसे कमजोर नागरिक किस स्थिति में जीवन जी रहे हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने मीडिया रिपोर्टों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई की। अदालत ने ओडिशा सरकार से कहा कि वह जन्म से दिव्यांग जपा भुए और उनकी 80 वर्षीय मां राधिका भुए को उपलब्ध सभी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ तत्काल प्रभाव से सुनिश्चित करे और उनकी जीवन स्थितियों में सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाए।

एक जर्जर घर में सिमटी पूरी दुनिया

मामला ओडिशा के सुबरनपुर जिले का है, जहां राधिका भुए अपने बेटे जपा भुए के साथ रहती हैं। जपा जन्म से दिव्यांग हैं और रोजमर्रा के कार्यों के लिए पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर हैं।

परिवार के मुखिया की मृत्यु के बाद मां-बेटे की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक दोनों एक जर्जर ढांचे में रहते हैं, जो उनके लिए रसोई, शयनकक्ष और बैठक—तीनों का काम करता है। सीमित संसाधनों और बढ़ती उम्र की चुनौतियों के बीच मां-बेटे का जीवन संघर्षों से घिरा हुआ है।

अदालत ने पूछा- क्या योजनाएं वास्तव में लोगों तक पहुंच रही हैं?

सुनवाई के दौरान ओडिशा सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि परिवार को एक आवास इकाई आवंटित की गई है। इसके अलावा राधिका भुए को वृद्धावस्था पेंशन और जपा भुए को दिव्यांग पेंशन भी दी जा रही है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस जानकारी को पर्याप्त नहीं माना। अदालत ने कहा कि उसका उद्देश्य केवल यह जानना नहीं है कि कौन-कौन सी योजनाएं कागजों पर उपलब्ध हैं, बल्कि यह देखना है कि क्या उन योजनाओं के कारण जरूरतमंद लोगों को वास्तव में सम्मानजनक जीवन मिल पा रहा है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत की चिंता राधिका भुए और उनके दिव्यांग बेटे के जीवन स्तर को लेकर है। उन्होंने कहा कि सामाजिक सुरक्षा का अर्थ केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अवसर उपलब्ध कराना भी है।

बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश

पीठ ने राज्य सरकार और उसके संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक मां-बेटे के लिए सभी आवश्यक बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं। अदालत ने कहा कि भोजन, आवास, स्वास्थ्य और अन्य जरूरी जरूरतों की पूर्ति में किसी तरह की कमी नहीं रहनी चाहिए।

साथ ही सरकार को यह भी बताने को कहा गया कि राधिका भुए को वृद्धावस्था पेंशन के अलावा कौन-कौन सी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिल रहा है। इसी प्रकार जपा भुए को दिव्यांगजन के रूप में उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं और योजनाओं का भी पूरा विवरण मांगा गया है।

दिव्यांग युवक को मिलेगी नई जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने जपा भुए को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किया। अदालत ने कहा कि उन्हें पैरालीगल वॉलंटियर के रूप में शामिल किया जाए और इसके बदले उन्हें नियमित मानदेय दिया जाए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मानदेय कानून के तहत निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं होना चाहिए। न्यायालय का मानना है कि जपा भुए अन्य दिव्यांगजनों को उनके अधिकारों, सरकारी योजनाओं और कानूनी सहायता संबंधी जानकारी देने में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं।

जमीनी हकीकत की जांच करेगा विधिक सेवा प्राधिकरण

मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को विशेष जिम्मेदारी सौंपी है। अदालत ने प्राधिकरण के सदस्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से परिवार से मिलने और उनके घर का दौरा करने का निर्देश दिया।

उन्हें यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि मां-बेटे की सभी आवश्यक जरूरतों का ध्यान रखा जाए। इसके साथ ही परिवार की वर्तमान स्थिति, सरकारी योजनाओं की पहुंच, आर्थिक परिस्थितियों और भविष्य में जरूरी सहायता का विस्तृत मूल्यांकन कर रिपोर्ट तैयार की जाएगी।

अलग आवास की पात्रता पर भी होगी समीक्षा

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया जाए कि राधिका भुए किसी सरकारी आवास योजना के तहत अलग आवास प्राप्त करने की पात्र हैं या नहीं। यदि वे पात्र हैं तो संबंधित विभागों को आवश्यक कार्रवाई करने के सुझाव भी रिपोर्ट में शामिल किए जाएं।

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि सुरक्षित और सम्मानजनक आवास किसी भी व्यक्ति के गरिमापूर्ण जीवन का महत्वपूर्ण आधार है।

जुलाई में पेश होगी प्रगति रिपोर्ट

शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई जुलाई के तीसरे सप्ताह में निर्धारित की है। तब तक ओडिशा सरकार और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को अदालत के समक्ष विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी होगी।

इस रिपोर्ट में यह बताया जाएगा कि मां-बेटे को कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं, उनकी जीवन स्थितियों में क्या सुधार हुआ और भविष्य में उनके लिए क्या अतिरिक्त सहायता आवश्यक है।

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