कोलकाताः नवरात्रि के नौ दिन देवी शक्ति की अराधना के लिए सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण समय होता है। इन नौ दिनों में माता रानी के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा का महत्व है लेकिन नौ कुंवारी कन्याओं की पूजा के लिए नवरात्रि व्रत पूर्ण नहीं माना जाता है। इसी परंपरा को कायम रखते हुए हर साल की तरह इस बार भी रामनवमी पर शुक्रवार को दक्षिणेश्वर रामकृष्ण संघ(आद्यापीठ) में दो हजार कुंवारी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर पूजा गया। यह परंपरा आद्यापीठ के संस्थापक स्वामी अन्नदा ठाकुर ने शुरु की थी। आद्यापीठ के ट्रस्टी व महासचिव ब्रह्मचारी मुराल भाई ने बताया कि बांग्ला के 22 चैत्र 1321 में आद्यापीठ में कुंवारी का प्रचलन शुरु हुआ। प्रथम बार जब अन्नदा ठाकुर ने कुंवारी शुरु कर तो अचानक चढा़वे की एक थाली बढ़ गई और एक कुंवारी कन्या आकर भोजन करके चली गईं। कौन थी वो बच्ची ? यह सवाल स्वामी के दिलों दिमाग में बैठ गया। एक दिन स्वामी के सपने में मां आद्या आयीं और बोली कि कुंवारी कन्याओं के साथ वह भी वहां विराजमान थीं। तभी से आद्यापीठ में कुंवारी पूजा का प्रचलन शुरु हो गया। शुक्रवार को ब्रह्मचारी मुराल भाई द्वारा मंत्रोच्चारण के साथ कुंवारी पूजन की गई। कुंवारी पूजन की भव्यता देखने लायक थी। कई महिलाएं अपनी-अपनी बच्चियों को ऋंगार कराकर आद्यापीठ पहुंची और उसका पूजन किया। जिस तरह से देवी के पूजन में फल का भोग लगाया जाता है, उसी तरह भोग लगाकर बच्चियों को परोसा गया। मुंह मीठा कराया गया। दावा है कि रामनवमी पर एक साथ दो हजार कुंवारी कन्याओं का पूजन दुनिया में कहीं भी नहीं होता है, सिवाय आद्यापीठ के। मां दुर्गा के नौ स्वरूप यानी नवदुर्गा के प्रतीक रूप में कन्याओं की पूजा की जाती है। भक्त कन्याओं के चरण धोते हैं, उन्हें तिलक लगाते हैं और भोजन कराकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। जैसा कि आद्यापीठ में कुंवारी पूजन में देखने को मिला। ऐसी मान्यता है कि इससे देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। साथ ही कन्या पूजन से घर पर सुख-समृद्धि का वास होता है।
कन्या पूजन के लाभ
कन्या पूजन की परंपरा सदियों से ही सनातन संस्कृति का हिस्सा है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि बेटियां देवी का रूप हैं और उनका सम्मान करना हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में कन्या पूजन करने से कई शुभ फल प्राप्त होते हैं और घर की नकारात्मकता दूर होकर सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।
कन्या पूजन के दौरान कुंवारियों के पैर धोना सिर्फ परंपरा मात्र नहीं है, बल्कि यह भक्ति, सेवा और विनम्रता का भी प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार, 'या देवी सर्वभूतेषु' के आधार पर हर कन्या में देवी का वास माना जाता है। इसलिए उनके चरण धोना देवी पूजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।