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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीतने के बावजूद पहचान की कमी पर मीराबाई का छलका दर्द

एशियाई खेलों में पहली बार पदक जीतने और 2028 ओलंपिक में पोडियम तक पहुंचने का लक्ष्य।

By रजनीश प्रसाद

Mar 27, 2026 12:56 IST

रायपुर : ओलंपिक रजत पदक विजेता मणिपुर की स्टार वेटलिफ्टर साइखोम मीराबाई चानू आज भी अपनी पहचान के साथ “वेटलिफ्टर” लिखना नहीं भूलतीं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स के उद्घाटन समारोह के बाद उन्होंने अपने संघर्ष, उपलब्धियों और अधूरे सपनों पर खुलकर बात की।

बुधवार रात करीब 10 बजे साइंस कॉलेज मैदान में आयोजित उद्घाटन समारोह में केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और हॉकी इंडिया के अध्यक्ष दिलीप तिर्की के साथ लगभग ढाई घंटे मंच पर बिताने के बाद भी मीराबाई के चेहरे पर मुस्कान बनी रही।

हालांकि जब उनसे पूछा गया कि ओलंपिक, विश्व चैंपियनशिप, कॉमनवेल्थ और एशियाई चैंपियनशिप में पदक जीतने के बावजूद वह क्रिकेटरों जैसी लोकप्रियता क्यों नहीं पा सकीं तो उनकी मुस्कान हल्की पड़ गई। उन्होंने कहा कि पदक जीतने के बाद उन्हें अधिकतम एक महीने तक ही पहचान मिलती है उसके बाद लोग भूल जाते हैं। उन्होंने माना कि यह पीड़ा देती है लेकिन वह खुद को इस बात से संतुष्ट करती हैं कि वह देश का झंडा ऊंचा करने के लिए खेलती हैं भले ही ग्लैमर न मिले।

मीराबाई ने बताया कि क्रिकेट सालभर खेला और दिखाया जाता है जबकि वेटलिफ्टिंग में बड़े मुकाबले एक-दो साल के अंतराल पर होते हैं जिससे खिलाड़ियों को निरंतर पहचान नहीं मिलती।

4 फुट 11 इंच लंबी और लगभग 46.5 किलोग्राम वजन वाली 31 वर्षीय मीराबाई के लिए वजन बनाए रखना बड़ी चुनौती है। उन्होंने बताया कि इस साल वह 49 किग्रा वर्ग के बजाय 48 किग्रा वर्ग में उतर रही हैं क्योंकि एशियन चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ गेम्स इसी वर्ग में होंगे। इसके बाद उन्हें फिर 49 किग्रा में लौटना होगा जिसके लिए कड़ी मेहनत और त्याग जरूरी है। उन्होंने कहा कि रोजाना अभ्यास करना पड़ता है एक दिन की चूक की भरपाई में एक सप्ताह लग जाता है और महीनों तक पसंदीदा भोजन छोड़ना पड़ता है।

2022 में बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने के बाद वह पीठ की चोट से जूझती रहीं। पूरी तरह फिट न होने के बावजूद उन्होंने पेरिस ओलंपिक में हिस्सा लिया लेकिन सिर्फ एक किलोग्राम कम वजन उठाने के कारण पदक से चूक गईं।

इसके बाद उन्होंने फिर से वापसी की लड़ाई शुरू की। मणिपुर से उत्तर प्रदेश के मोदीनगर में बस चुकी मीराबाई ने केंद्रीय खेल मंत्रालय की मदद से अपने कोच विजय शर्मा के साथ “वॉरियर्स” नाम की अकादमी स्थापित की है। यहां वह 50 जूनियर वेटलिफ्टरों को प्रशिक्षण देने के साथ खुद भी अभ्यास कर रही हैं ताकि अपने जीवन की एक बड़ी कमी को पूरा कर सकें।

खेल रत्न और पद्मश्री से सम्मानित मीराबाई ने बताया कि उन्होंने लगभग हर बड़े टूर्नामेंट में पदक जीता है लेकिन एशियाई खेलों का पदक अभी तक नहीं मिला है। इस साल जापान में होने वाले एशियन गेम्स में पदक जीतना उनका लक्ष्य है। इसके बाद उनका अगला लक्ष्य 2028 के लॉस एंजेलिस ओलंपिक में भाग लेकर पोडियम तक पहुंचना है।

मुस्कान के पीछे छिपे इस संकल्प के साथ मीराबाई चानू अपने अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं।

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