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पहलगाम आतंकी हमला बरसी: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘ऑपरेशन महादेव’ के बाद भी जिंदा है दर्द

बैसरन घाटी हमला: एक वर्ष बाद पीड़ित परिवारों की हालत, आतंक के खिलाफ भारत की कार्रवाई

By प्रियंका महतो

Apr 22, 2026 13:19 IST

श्रीनगर: पहलगाम हमले की पहली बरसी: बदला लिया गया, फिर भी शोक की अग्नि शांत नहीं हुई आक्रोश के घावों पर शायद कुछ मरहम लगा है, लेकिन दिल के घाव? एक वर्ष बीतने के बाद अपने प्रियजनों को खोने वाले परिवार कैसे हैं? और बैसरन घाटी आज कैसी है? जब मानवता की सीमाएं लांघी जाती हैं, तो प्रतिक्रिया निर्णायक होती है। न्याय हो चुका है। भारत एकजुट है। कुछ सीमाएं कभी पार नहीं की जानी चाहिए। भारत कुछ भी नहीं भूलता।’

आज, बुधवार को पहलगाम हमले की बरसी से ठीक एक दिन पहले मंगलवार को सेना की ओर से देशवासियों के लिए यह संदेश जारी किया गया। धर्म पूछकर चुन-चुन कर निर्दोष पर्यटकों को नजदीक से गोली मारकर पहलगाम की बैसरन घाटी को खून से लाल कर दिया था लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों ने। देशवासियों की नसों में जो उग्र आक्रोश उमड़ा था, उसका जवाब भारत ने दो चरणों में दिया। पहले ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान के कई आतंकी ठिकानों और वायुसेना अड्डों को नष्ट किया गया, और फिर ‘ऑपरेशन महादेव’ में बैसरन के तीन आतंकियों—सुलेमान शाह, हमजा अफगानी और जिबरान—को मार गिराया गया। इससे गुस्से के घावों पर कुछ राहत जरूर मिली, लेकिन दिल के जख्म? एक साल बाद भी वे वैसे ही हैं। परिवारों की हालत क्या है, और बैसरन घाटी कैसी है—यह सवाल अब भी बना हुआ है।

बादलों से ढके पहाड़ों की पृष्ठभूमि में बैसरन की हरी घास पर अपने पति के निर्जीव शरीर के सामने बैठी एक युवती की तस्वीर ने पूरे देश को शोक और गुस्से से भर दिया था। शहीद नौसेना अधिकारी विनय नरवाल की नवविवाहिता पत्नी हिमांशी ने सब कुछ खोने के बाद भी अपील की थी, ‘मुसलमानों और कश्मीरियों को निशाना न बनाएं। लड़ाई आतंकवादियों के खिलाफ है, उनके खिलाफ नहीं।’ इस बयान के कारण उन्हें पूरे एक वर्ष तक सोशल मीडिया पर आलोचना झेलनी पड़ी और वह सार्वजनिक जीवन से दूर ही रहीं। वहीं, विनय के पिता राजेश आज भी पछतावे में कहते हैं, ‘पता नहीं क्यों इतनी कम उम्र में उसकी शादी कर दी। लड़की का भी जीवन…’

केंद्रीय खुफिया एजेंसी के अधिकारी, पुरुलिया के झालदा निवासी मणिशरंजन मिश्रा का शरीर आतंकवादियों की स्वचालित हथियारों से छलनी कर दिया गया था। उनकी पत्नी जया अब तक सामान्य नहीं हो सकी हैं। मणिश के भाई विनीत बताते हैं कि जया अपने दो बच्चों के साथ अधिकतर इलाहाबाद में अपने मायके में रहती हैं और कभी-कभी झालदा आती हैं। विनीत कहते हैं, ‘भाभी कभी-कभी असामान्य व्यवहार करने लगती हैं। कुछ दिन पहले ही वह बेहोश हो गई थीं। भैया बहुत अच्छा गाते थे, मां अब चुपचाप मोबाइल में रिकॉर्ड किए गए उनके गाने सुनती रहती हैं।’

पुणे की आशाबरी के सामने ही उनके पिता संतोष जागदाले गिर पड़े थे। वह कहती हैं, ‘मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी। यह एक साल जैसे नरक में बीता है।’ एक अन्य मृतक पर्यटक प्रशांत कुमार शतपथी की पत्नी प्रियदर्शिनी की आवाज भर्रा जाती है—‘सब कहते हैं, जीवन चलता रहता है। लेकिन मेरा जीवन उसी दिन ठहर गया।’ बेंगलुरु की डॉक्टर सुजाता अब भी समझ नहीं पा रही हैं कि अपने साढ़े चार साल के बेटे को मानसिक रूप से कैसे संभालें। बच्चे के सामने ही उनके पति भरत भूषण को आतंकवादियों ने गोली मार दी थी। सुजाता कहती हैं, ‘वह अब भी कहता है—पापा को बहुत दर्द हो रहा है मम्मा, कितना खून!’

वायुसेना में कॉरपोरल पद पर तैनात तागे हेलयांग भी आतंकियों की गोली से शहीद हो गए थे। उनके परिवार ने उनकी स्मृति में एक स्मारक बनाया है। उस रक्तरंजित 22 अप्रैल की भयावहता को पीछे छोड़ते हुए, नरसंहार की पीड़ा को सीने में लिए पहलगाम में एक बार फिर पर्यटक लौटने लगे हैं। 26 मृतकों की स्मृति में बैसरन में एक स्मारक बनाया गया है। घाटी अब कड़ी सुरक्षा के घेरे में है। पर्यटन सेवा प्रदाताओं के लिए बारकोड प्रणाली लागू की गई है, जिसे पुलिस नियमित रूप से स्कैन करती है, और सारी जानकारी तुरंत सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंच जाती है।


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