नई दिल्ली: केंद्रीय सरकार का उद्देश्य सफल नहीं हुआ। एकजुट विपक्षी गठबंधन के दबाव के कारण लोकसभा सीटों के पुनर्विन्यास के लिए मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदम फ्लॉप हो गए। विपक्ष में इस जीत का प्रमुख सोनिया गांधी हैं। शनिवार को राज्यसभा में विपक्षी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के संसदीय कक्ष में आयोजित बैठक में सोनिया गांधी उपस्थित नेताओं से सवाल किया कि अब सब मौन क्यों है ? इसके बाद ही जश्न शुरू हो जाता है। मुख्य रूप से सोनिया के उत्साह के कारण बैठक में उपस्थित अन्य लोग 'लेट्स सेलिब्रेट' कह उठते हैं। रातोंरात मिठाई, चाय, कॉफी, कुकीज़ लाए जाते हैं।
कांग्रेस सूत्रों का दावा है, पर्दे के पीछे से पिछले कुछ दिनों से विपक्षी गठबंधन की रणनीति बनाने का मुख्य काम खुद पार्टी की संसदीय दल की चेयरपर्सन ने किया। शुक्रवार रात को लोकसभा में महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन बिल असफल हो गया। बंगाल में विधानसभा चुनावों के माहौल में जिस तरह तृणमूल सुप्रीमो ने 21 सांसदों को दिल्ली में लोकसभा वोटिंग में भेजा, उसके लिए रात ही व्यक्तिगत रूप से ममता बनर्जी को धन्यवाद देते हुए सोनिया गांधी ने फोन किया। शुक्रवार को लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी फोन करके तृणमूल के लोकसभा नेता अभिषेक बनर्जी को धन्यवाद दिया। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी ममता को फोन कर शुभकामनाएं दी। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सोनिया-ममता और राहुल-अभिषेक की यह बातचीत व्यापक प्रभाव डाल सकती है, ऐसा राजनीतिक जानकारों का एक वर्ग का अपना विचार है।
उल्लेखनीय है कि अस्सी वर्ष की उम्र की दहलीज पर पहुँच रही सोनिया गांधी का स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक नहीं है। कुछ दिन पहले गंभीर हालत में वह दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती थीं। इतनी समस्याओं के बावजूद डिलिमिटेशन बिल को रोकने के लिए जिस तरह से शुरू से ही सक्रिय रही सोनिया, वह तात्पर्यपूर्ण है, ऐसा कांग्रेस सूत्रों का दावा है। उन्होंने देशव्यापी अंग्रेज़ी समाचारपत्र के संपादकीय में विरोधियों के साथ किसी भी चर्चा के बिना ही डिलिमिटेशन के मामले में केंद्र की सोच का कठोर विरोध किया। यहाँ तक नहीं रुकते हुए उन्होंने संसदीय रणनीति तैयार करने का काम शुरू किया। विरोधी गठबंधन एकजुट रहेगा तो सरकार किसी भी तरह लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं कर पाएगी, सोनिया के इस निश्चित वाक्य को मानते हुए वरिष्ठ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस के 'अहंकार' को किनारे रखते हुए सभी विपक्षी दलों को एकजुट करने का काम शुरू किया। इसके परिणामस्वरूप 'टीम–इंडिया' के सामने लोकसभा में ट्रेज़री बेंच पर धक्का लग गया। दो-तिहाई बहुमत से बहुत दूर रहते हुए, सरकार को 298 वोटों पर रुकना पड़ा। विपक्ष को 230 वोट मिले। सूत्रों का दावा है, विपक्षीय एकता की इस सफलता से खुश सोनिया शनिवार सुबह संसद में विपक्षी दल की बैठक में शामिल हुईं। सरकार के खिलाफ खड़े होने के लिए सभी विपक्षी दलों से अपील करते हुए उन्होंने कहा, 'देश के सामने विपक्षियों की स्थिति स्पष्ट रूप से पेश करनी होगी। यह कहना होगा कि विपक्षी महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, वे परिणामहीन सीमा निर्धारण के खिलाफ हैं।' महत्वपूर्ण यह है कि 2010 में कांग्रेस की पहल पर महिला आरक्षण बिल पहली बार राज्यसभा में पारित हुआ था। उस समय सरकार के दो साझीदार लालू प्रसाद यादव की आरजेडी और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी द्वारा ओबीसी आरक्षण की मांग उठाए जाने के कारण कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार ने बिल को लोकसभा में पेश ही नहीं किया। इसके बाद 2023 में जब मोदी सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण से संबंधित 'नारी शक्ति बंदन' अधिनियम बिल पारित किया, तब उसी समय विरोध जताते हुए सोनिया ने कहा, 'वो बिल हमारा था।' कांग्रेस सूत्रों का दावा है कि कुछ दिन पहले कांग्रेस वर्किंग कमिटी (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में भी सोनिया गांधी के इस बयान पर चर्चा हुई। महिला आरक्षण का समर्थन करने के साथ-साथ सरकार की डिलिमिटेशन पहल के कठोर विरोध में सोनिया द्वारा निर्देशित दिशा में सभी विरोधी दलों को एकजुट करके आगे बढ़ने का निर्णय भी उसी बैठक में लिया गया।