नई दिल्ली : क्या किसी विशेष पेशे के लोग पोर्नोग्राफी के प्रति ज्यादा या कम आकर्षित होते हैं? इस पर अब तक कोई ठोस शोध सामने नहीं आया है लेकिन बिहार के पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने एक विवादित दावा कर सियासी हलकों में हलचल मचा दी है।
शनिवार को लोकसभा में ‘महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक 2026’ पर चर्चा के दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि देश में सबसे ज्यादा पोर्नोग्राफी देखने वाले लोग राजनीतिज्ञ ही हैं। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी दावा किया कि यौन उत्पीड़न के सबसे अधिक मामले भी नेताओं के खिलाफ ही दर्ज हैं।
पप्पू यादव के इस बयान के बाद सदन में जोरदार हंगामा शुरू हो गया। कई सांसदों ने ‘शर्म करो’ के नारे लगाए और विपक्षी सांसदों ने टेबल थपथपाकर विरोध जताया। हालांकि अतीत में कर्नाटक, बिहार और त्रिपुरा की विधानसभाओं में कुछ जनप्रतिनिधियों के पोर्न देखते पकड़े जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं लेकिन संसद में ऐसे मामलों की स्पष्ट जानकारी नहीं है।
अपने आरोपों के समर्थन में पप्पू यादव ने आंकड़े भी पेश किए। उन्होंने दावा किया कि देश के 755 सांसदों में से 155 के खिलाफ यौन उत्पीड़न के मामलों में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है। उनके मुताबिक यौन अपराधों में सबसे आगे राजनीतिज्ञ हैं इसके बाद धार्मिक गुरु और सरकारी अधिकारी आते हैं। उन्होंने कहा- “कोई भी कानून से ऊपर नहीं है सभी को जवाबदेह होना होगा।”
इसके साथ ही उन्होंने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक का कड़ा विरोध किया। उनका आरोप है कि केंद्र सरकार पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों के हितों की अनदेखी कर रही है। उन्होंने ओबीसी, ईबीसी, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों के लिए अलग आरक्षण की मांग उठाई।
समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं है बल्कि समाज में गहराई तक मौजूद असमानता को खत्म करना भी जरूरी है।
पप्पू यादव ने यह भी दावा किया कि फिल्म, मीडिया और फैशन जगत में 80 प्रतिशत महिलाएं यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं और इस मुद्दे पर भी गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
उनके इस बयान से राजनीतिक माहौल गरमा गया है। कई लोगों ने उनके दावों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया और कहा कि उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं दिया। हालांकि कुछ का मानना है कि भले ही यह बयान असहज करने वाला हो लेकिन इस विषय पर खुलकर चर्चा जरूरी है।