नई दिल्लीः लोकसभा में शुक्रवार को महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पर सरकार को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। मतदान में 298 सांसदों ने समर्थन किया, जबकि 230 सांसदों ने विरोध में वोट दिया। हालांकि समर्थन संख्या अधिक होने के बावजूद यह विधेयक पारित नहीं हो सका, क्योंकि इसे संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं हुआ।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने परिणाम घोषित करते हुए स्पष्ट किया कि आवश्यक संवैधानिक बहुमत न मिलने के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो पाया। इस फैसले के साथ ही सरकार की महिला आरक्षण को लागू करने की तत्काल रणनीति को बड़ा झटका लगा।
डीलिमिटेशन बना टकराव की जड़
विधेयक पर सबसे बड़ा विवाद डीलिमिटेशन (निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण) से जुड़े प्रावधानों को लेकर रहा। सरकार ने महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया को डीलिमिटेशन और अन्य विधेयकों के साथ जोड़कर पेश किया था।
विपक्षी दलों ने इसी बिंदु को आधार बनाकर सरकार पर हमला तेज कर दिया। उनका तर्क था कि महिला आरक्षण को मौजूदा लोकसभा संरचना में तुरंत लागू किया जाना चाहिए और इसे जनगणना या डीलिमिटेशन जैसी प्रक्रियाओं से जोड़ना इसकी वास्तविक भावना को कमजोर करता है। यही मतभेद पूरे विधेयक के राजनीतिक टकराव का केंद्र बन गया, जिसने सदन के भीतर सहमति की संभावना को कमजोर कर दिया।
विपक्ष की रणनीति और तीखा राजनीतिक हमला
बहस के दौरान विपक्षी दलों ने सरकार पर आरोप लगाया कि यह विधेयक महिला सशक्तिकरण से अधिक राजनीतिक पुनर्संरचना का प्रयास है। राहुल गांधी ने इसे “चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश” बताया और कहा कि इसका उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों से अधिक राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करना है।
प्रियंका गांधी वाड्रा ने इसे लोकतंत्र से जुड़ा मुद्दा बताते हुए डीलिमिटेशन को जोड़ने पर सवाल उठाया। शशि थरूर ने इसे लोकतंत्र बचाने की “निर्णायक जीत” बताया और कहा कि विपक्ष ने विधेयक के मूल उद्देश्य के खिलाफ नहीं, बल्कि इसके स्वरूप के खिलाफ मतदान किया।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, लेकिन सरकार की प्रक्रिया और शर्तों पर आपत्ति है।
सरकार का पलटवार और सियासी संदेश
सरकार ने विपक्ष के रुख को महिला आरक्षण के खिलाफ बताया। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि यह विधेयक “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” के तहत 33% आरक्षण लागू करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम था, लेकिन विपक्ष ने इसे रोक दिया।
उन्होंने विपक्ष पर राजनीतिक अवसरवाद का आरोप लगाते हुए कहा कि यह फैसला जनता, विशेषकर महिलाओं के बीच राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा करेगा। भाजपा नेताओं ने भी विपक्ष पर महिला सशक्तिकरण के अवसर को रोकने का आरोप लगाया और कहा कि यह देश के लिए खोया हुआ अवसर है। वहीं, सरकार के वरिष्ठ मंत्री प्रह्लाद जोशी और अन्य नेताओं ने कहा कि जनता आने वाले चुनावों में इस रुख का जवाब देगी।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर दिखाया कि महिला आरक्षण जैसे सामाजिक मुद्दे भी भारत की संसदीय राजनीति में गहरे वैचारिक और रणनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन चुके हैं, जहां सहमति की बजाय टकराव निर्णायक भूमिका निभा रहा है।