नई दिल्ली/कोलकाता: I-PAC से जुड़े छापों के मामले में पश्चिम बंगाल सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि इस मामले को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को सौंपा जाए। राज्य का कहना है कि यह विवाद संविधान की व्याख्या से जुड़े अहम सवाल उठाता है, खासकर केंद्र और राज्य के अधिकारों तथा प्रवर्तन निदेशालय (ED) की याचिका की वैधता को लेकर।
राज्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन के पीठ के सामने दलील दी कि इस तरह के संवैधानिक मुद्दों पर दो जजों का पीठ फैसला नहीं कर सकता। उनके अनुसार यह मामला संघीय ढांचे और केंद्र-राज्य संबंधों की मूल संरचना से जुड़ा है।
दीवान ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 32 का इस्तेमाल इस तरह नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे संघीय व्यवस्था प्रभावित होती है। उनका कहना था कि केंद्र और राज्य के बीच विवाद सुलझाने के लिए संविधान में एक निर्धारित प्रक्रिया है, जिसे दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि ED केंद्र सरकार का एक विभाग है, स्वतंत्र कानूनी इकाई नहीं है और अपने नाम से अदालत में याचिका दायर करने का अधिकार नहीं रखता। साथ ही मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का दावा भी वह इस प्रकार नहीं कर सकता क्योंकि इन अधिकारों की रक्षा स्वयं संघ करता है।
राज्य सरकार ने यह भी दलील दी कि इस तरह के मामलों में संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही समाधान होना चाहिए और अनुच्छेद 32 का सहारा लेकर प्रक्रिया को नहीं बदला जा सकता। इसलिए इस विवाद को संविधान पीठ के सामने रखा जाना जरूरी है।
यह सुनवाई ED की उस याचिका पर हो रही है, जिसमें राज्य सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर I-PAC कार्यालय में छापे के दौरान बाधा डालने का आरोप लगाया गया है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा, लेकिन अदालत ने इसे खारिज करते हुए आगे की बहस जारी रखने को कहा।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट राज्य की उस आपत्ति को भी खारिज कर चुका है, जिसमें कहा गया था कि मामला कलकत्ता हाई कोर्ट में सुना जाना चाहिए। अदालत ने माना कि यह व्यापक संवैधानिक महत्व का मामला है, जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में ही होनी चाहिए।
ममता बनर्जी और राज्य सरकार ने अपने जवाब में ED की याचिका की वैधता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अनुच्छेद 32 का दायरा केवल मौलिक अधिकारों के संरक्षण तक सीमित है और इसे सामान्य कानूनी विवादों में लागू नहीं किया जा सकता।
इसके अलावा, राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि ED ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) के तहत उपलब्ध वैकल्पिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया। साथ ही एजेंसी पर अलग-अलग अदालतों में एक ही तरह की याचिका दाखिल करने यानी “फोरम शॉपिंग” का भी आरोप लगाया गया है।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जारी है और आगे की दलीलें सुनी जा रही हैं।