नई दिल्ली : कौन सही है और कौन गलत, इसका फैसला अभी करना संभव नहीं है। पश्चिम एशिया में हालिया भू-राजनीतिक स्थिति अस्थिर बनी हुई है। जिसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर आकलनों में भी दिख रहा है। केंद्र की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का नजरिया अलग है। वहीं गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs), ऑस्ट्रेलिया एंड न्यूजीलैंड बैंकिंग ग्रुप, इंडसइंड बैंक और नोमुरा जैसे संस्थानों के अर्थशास्त्रियों की राय अलग है। दोनों पक्षों के विचार एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत नजर आ रहे हैं।
मंगलवार को निर्मला ने दावा किया कि दुनिया भर में लगातार चल रहे संकटों के झटकों को झेलने की पर्याप्त क्षमता भारतीय अर्थव्यवस्था में है। इतना ही नहीं, संसद में अपने संबोधन के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि देश में एलपीजी सहित ईंधन की स्थिति को लेकर कोई तात्कालिक संकट नहीं है। हॉर्मुज मार्ग के जरिए देश में ईंधन आपूर्ति पहले ही शुरू की जा चुकी है। साथ ही, बढ़ती मांग को पूरा करने में जो समस्या आ रही थी, उसके समाधान के लिए घरेलू स्तर पर उत्पादन भी 25 प्रतिशत बढ़ाया गया है।
हालांकि, वित्त मंत्री द्वारा दिखाई जा रही इस राहत भरी तस्वीर के बावजूद कई विशेषज्ञ संस्थाओं के अर्थशास्त्री युद्ध जैसी स्थिति के कारण 2026-27 वित्त वर्ष में महंगाई और बढ़ने की चेतावनी दे रहे हैं।
खास तौर पर रसोई गैस (एलपीजी) की आपूर्ति को लेकर जो चिंता पैदा हुई थी, उसे दूर करने के लिए वित्त मंत्री ने कई फैसलों की घोषणा की। उन्होंने बताया कि विदेशी निर्भरता और युद्ध के जोखिम को कम करने के लिए भारत ने देश में एलपीजी का उत्पादन लगभग 25 प्रतिशत बढ़ा दिया है। प्रोपेन और ब्यूटेन गैस का उपयोग करके यह उपलब्धि हासिल की गई है।
संसद में अतिरिक्त व्यय प्रस्ताव पेश करते हुए निर्मला ने गैस आपूर्ति के साथ-साथ ग्रामीण रोजगार और किसानों के लिए भी बड़े ऐलान किए। 100 दिन के रोजगार योजना के बकाया भुगतान के लिए 30,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं और 1 अप्रैल से इस योजना पर कुल 95,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
आने वाले रबी सीजन को ध्यान में रखते हुए उर्वरक की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए केंद्र ने 19,230 करोड़ रुपये अग्रिम रूप से आवंटित किए हैं। इसके अलावा, छोटे व्यापारियों और एमएसएमई क्षेत्र की समस्याओं को दूर करने के लिए सिडबी के माध्यम से 3,000 करोड़ रुपये की ऋण सहायता दी गई है और जम्मू-कश्मीर के लिए अतिरिक्त 5,000 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता की घोषणा की गई है।
संघर्ष का प्रभाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, यह आम लोगों के अनुभव में भी साफ दिखाई दे रहा है। ईंधन की कीमतें बढ़ने से शहर के एक डिलीवरी कर्मी की दैनिक आय आधे से भी ज्यादा घट गई है। उसकी कमाई का बड़ा हिस्सा अब पेट्रोल पर खर्च हो रहा है, जिससे थोड़ी सी कीमत बढ़ने पर भी जीवनयापन मुश्किल हो जाता है। पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़े गिग अर्थव्यवस्था के कर्मचारी भी इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
औद्योगिक क्षेत्र में भी स्थिति चिंताजनक है। उर्वरक, एल्युमिनियम से लेकर सेमीकंडक्टर उद्योग में इस्तेमाल होने वाली हीलियम की आपूर्ति बाधित हो रही है। कई राज्यों में फैक्ट्रियां बंद होने की खबरें मिल रही हैं, खासकर इंजीनियरिंग उद्योग पर इसका व्यापक असर पड़ा है। इसकी वजह से रोजगार और निर्यात दोनों पर बड़ा झटका लगने की आशंका है।
खाड़ी देशों में भारत का लगभग 18.48 लाख करोड़ रुपये का निर्यात होता है और वहीं से बड़ी मात्रा में प्रवासी आय भी आती है। वर्तमान स्थिति में इन दोनों क्षेत्रों में अनिश्चितता बढ़ गई है, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है और भारतीय मुद्रा के विनिमय दर पर दबाव पड़ सकता है।
दूसरी ओर, खुदरा कीमतों में महंगाई दर के फिर से बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। पिछले वर्ष महंगाई को नियंत्रित करने में सफलता मिली थी, लेकिन मौजूदा हालात में यह फिर से लगभग 6 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, ऐसा अर्थशास्त्रियों का मानना है।