नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा ढांचे में बाधाएं और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड की कीमत फरवरी के अंत में 73 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है।
इराक, सऊदी अरब और कुवैत में उत्पादन कटौती तथा कतर और सऊदी अरब में बड़े ऊर्जा संयंत्रों के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला पर बड़ा असर पड़ा है। भारत, जो अपनी अधिकांश तेल जरूरतों का आयात करता है और जिसका आधे से ज्यादा आयात हॉर्मुज मार्ग से होता है, इस स्थिति में अधिक संवेदनशील बन गया है।
एचडीएफसी सिक्योरिटीज इंस्टीट्यूशनल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार तेल विपणन कंपनियों के एकीकृत मार्जिन पर दबाव बढ़ने की संभावना है, क्योंकि कच्चे तेल की कीमत बढ़ने के बावजूद खुदरा ईंधन कीमतों में बदलाव नहीं हुआ है। हालांकि, सकल रिफाइनिंग मार्जिन में तेज सुधार हुआ है, लेकिन मार्केटिंग मार्जिन में कमी से इसका लाभ सीमित रह सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय रिफाइनरियों के सामने सीमित कच्चे तेल की उपलब्धता और बढ़ती परिवहन लागत के बीच देश की जरूरतें पूरी करने की चुनौती है। वहीं, सिटी गैस वितरण कंपनियां गैस की कमी, ऊंची कीमतों और डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से जूझ रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार मार्केटिंग मार्जिन में प्रति लीटर 1 रुपये की गिरावट से प्रमुख ओएमसी कंपनियों की प्रति शेयर आय (EPS) में 20-24% तक कमी आ सकती है। इनमें इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी गई है, क्योंकि उसकी निर्भरता मार्केटिंग मार्जिन पर कम है।
सिंगापुर के GRM मार्च की शुरुआत में फरवरी के औसत की तुलना में लगभग दोगुने हो गए हैं, जिसका कारण पेट्रोल और डीजल मार्जिन में तेज बढ़ोतरी है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से इन्वेंट्री लाभ भी वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में आय को कुछ सहारा दे सकता है।
इसके विपरीत अपस्ट्रीम तेल उत्पादक कंपनियों को ऊंची कीमतों और कमजोर रुपये से लाभ मिलने की संभावना है। तेल और गैस की बेहतर कीमतों से उनकी लाभप्रदता बढ़ सकती है, बशर्ते सरकार अतिरिक्त कर न लगाए।
रिपोर्ट कह रही है कि इस समय तेल की ऊंची कीमतें और रुपये के कमजोर होने से सबसे ज्यादा फायदा अपस्ट्रीम (तेल उत्पादन करने वाली) कंपनियों को हो रहा है। इन दोनों कारणों से उनकी कमाई बढ़ सकती है।
कच्चे तेल की कीमत में 70 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर हर 5 डॉलर की बढ़ोतरी पर अपस्ट्रीम कंपनियों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है। इनमें ऑयल इंडिया को ओएनजीसी की तुलना में बेहतर माना गया है, क्योंकि उसके उत्पादन वृद्धि की संभावना अधिक है।
वैश्विक स्थिति में अनिश्चितता को देखते हुए, रिपोर्ट ने अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम दोनों क्षेत्रों के लिए अपने अनुमान और सिफारिशों में कोई बदलाव नहीं किया है।
कुल मिलाकर मौजूदा तेल संकट का असर क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों पर अलग-अलग पड़ रहा है—जहां अपस्ट्रीम कंपनियों को फायदा हो रहा है, वहीं डाउनस्ट्रीम कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है। यह स्थिति ऊर्जा क्षेत्र में निवेश के लिए सही संतुलन की अहमियत को दर्शाती है।