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सिर्फ इंजेक्शन ही नहीं, अब भारत के बाजार में इंसुलिन इनहेलर में भी उपलब्ध

डायबिटीज के इलाज में, खासकर बच्चों के टाइप–1 डायबिटीज के मामले में यह एक महत्वपूर्ण तकनीकी मील का पत्थर बन सकता है।

डायबिटीज के इलाज में अब देश को एक नई दिशा मिली है। भारत की प्रसिद्ध फार्मास्यूटिकल कंपनी सिपला ने घरेलू बाजार में अफ्रेजा पेश किया है, एक अनोखा बिना सुई वाला इंसुलिन इनहेलर। यह आने वाले समय में पारंपरिक इंजेक्शन आधारित इलाज को चुनौती दे सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि खासकर बच्चों के टाइप–1 डायबिटीज के इलाज में अफ्रेजा एक बड़ा तकनीकी मील का पत्थर साबित हो सकता है। कंपनी का दावा है कि यह दुनिया का एकमात्र रैपिड–एक्टिंग इंसुलिन है जिसे इनहेलर के जरिए सांस के साथ लिया जा सकता है। इससे रोज कई बार इंजेक्शन लेने की जरूरत कम हो सकती है।

अफ्रेजा दरअसल ड्राई पाउडर इंसुलिन है, जिसे एक छोटे हैंडहेल्ड इनहेलर डिवाइस के जरिए लिया जाता है। मरीज को सिर्फ इंसुलिन कार्ट्रिज इनहेलर में लगाकर सांस के साथ पफ लेना होता है, जिससे इंसुलिन शरीर में पहुंच जाता है। इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती। भारत में एक इनहेलर और चार कार्ट्रिज के पैक की अधिकतम कीमत 3,999 रुपये रखी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, अभी कीमत ज्यादा लग सकती है लेकिन भविष्य में इसके कम होने की संभावना है।

डॉक्टरों का कहना है कि यह तकनीक इंसुलिन देने के तरीके में बड़ा बदलाव ला सकती है। यह शरीर में तेजी से अवशोषित होता है और खाने के समय ही असर दिखाता है, जिससे यह शरीर की प्राकृतिक इंसुलिन प्रतिक्रिया के करीब काम करता है। चूंकि इसमें सुई का इस्तेमाल नहीं होता इसलिए मरीजों की मानसिक झिझक भी कम होती है। इसी कारण इसके उपयोग को लेकर कंपनियां और विशेषज्ञ आशावादी हैं। भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, जिनमें से कई को इंसुलिन की जरूरत होती है लेकिन नियमित उपयोग अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचा है।

केंद्रीय औषधि नियामक संस्था सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन द्वारा मंजूरी मिलने के बाद सिपला ने इसे जल्दी ही बाजार में उतार दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि इंजेक्शन का डर और असुविधा कई बार इलाज जारी रखने में बाधा बनती है और ऐसे में यह इनहेलर एक नया विकल्प देता है। फिलहाल यह वयस्कों के टाइप–1 और टाइप–2 डायबिटीज मरीजों के लिए उपयोगी है। कंपनी के अनुसार, यह नवाचार इलाज को आसान बनाएगा और मरीजों में नियमित इंसुलिन लेने की प्रवृत्ति बढ़ाएगा।

एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञ सतीनाथ मुखोपाध्याय का मानना है कि भविष्य में जब इसे बच्चों के उपयोग के लिए भी मंजूरी मिलेगी, तब यह टाइप–1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों के लिए भी बहुत लाभदायक हो सकता है। खासकर उन मरीजों के लिए जो हर भोजन के समय कई बार इंसुलिन लेते हैं लेकिन इंसुलिन पंप का खर्च नहीं उठा सकते, उनके लिए यह एक आसान विकल्प होगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि क्योंकि यह मुख्य रूप से भोजन के बाद बढ़ने वाले शुगर लेवल को नियंत्रित करता है इसलिए अधिकतर मामलों में इसके साथ एक बेसल यानी लंबी अवधि तक असर करने वाले इंसुलिन की जरूरत बनी रहेगी।

डॉक्टरों ने यह भी चेतावनी दी है कि कुछ मरीजों के लिए इनहेलर के जरिए ज्यादा मात्रा में इंसुलिन लेना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। वहीं अस्थमा या सीओपीडी जैसी सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों में इसकी प्रभावशीलता कम हो सकती है।

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