वॉशिंगटन: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और उसके सहयोगियों के रिश्तों में दरार साफ दिखाई देने लगी है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिक्रिया ने यह संकेत दिया है कि अंतरराष्ट्रीय सैन्य सहयोग अब पहले जैसा सहज नहीं रह गया है।
ट्रंप की नाराज़गी का केंद्र यह है कि कई पारंपरिक सहयोगी देश, खासकर नाटो से जुड़े राष्ट्र ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई में खुलकर साथ देने से हिचकिचा रहे हैं। यह स्थिति उस समय सामने आई है जब होरमुज़ जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री मार्ग पर तनाव बढ़ा हुआ है, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या वैश्विक सुरक्षा ढांचा अब बदल रहा है? अमेरिका लंबे समय से खुद को अपने सहयोगियों का प्रमुख सुरक्षा प्रदाता मानता रहा है, लेकिन अब जब उसे समर्थन की जरूरत महसूस हो रही है, तो कई देश दूरी बनाए हुए हैं। इससे ट्रंप का यह तर्क मजबूत होता दिख रहा है कि मौजूदा व्यवस्था संतुलित नहीं है।
दूसरी ओर यह भी समझना जरूरी है कि अन्य देश सीधे टकराव से बचना क्यों चाहते हैं। पश्चिम एशिया का जटिल भू-राजनीतिक माहौल, ऊर्जा बाजार पर संभावित असर और बड़े युद्ध का खतरा ये सभी कारण देशों को सतर्क रुख अपनाने के लिए मजबूर करते हैं।
अमेरिका की सैन्य क्षमता पर भरोसा जताते हुए ट्रंप का यह कहना कि उन्हें किसी की मदद की आवश्यकता नहीं है, एक मजबूत राजनीतिक संदेश तो देता है, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव भी हो सकते हैं। इससे सहयोगी देशों के साथ संबंधों में और खिंचाव आ सकता है।
यह स्थिति केवल एक सैन्य या कूटनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक समीकरणों की ओर इशारा करती है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ तालमेल बैठा पाता है या अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों की संरचना में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलता है।