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IIT गुवाहाटी का बड़ा कमालः एक ही सामग्री से बनेगा ग्रीन हाइड्रोजन और मिलेगा पीने का साफ पानी

ग्रीन एनर्जी और जल संकट पर भारत की बड़ी छलांग। हाइड्रोजन और पानी-दोनों मोर्चों पर भारत की टेक्नोलॉजी जीत।

By श्वेता सिंह

Mar 17, 2026 19:52 IST

गुवाहाटीः भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गुवाहाटी (IIT Guwahati) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा उन्नत मटेरियल विकसित किया है, जो एक साथ ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करने के साथ ही समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने में सक्षम है। यह खोज स्वच्छ ऊर्जा और सुरक्षित पेयजल दोनों वैश्विक चुनौतियों का समाधान पेश करती है।

इस शोध को प्रतिष्ठित जर्नल एडवांस्ड फंक्शनल मैटेरियल्स में प्रकाशित किया गया है। इस अध्ययन का नेतृत्व प्रोफेसर पी.के. गिरि और उनकी टीम-कौशिक घोष व संजय सुर रॉय ने किया।

कम ऊर्जा में हाइड्रोजन उत्पादन

इस नए मटेरियल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पानी के इलेक्ट्रोलिसिस (Electrolysis) के जरिए बेहद कम ऊर्जा में हाइड्रोजन उत्पन्न कर सकता है। जहां सामान्यतः जल विभाजन के लिए 1.23 वोल्ट ऊर्जा की जरूरत होती है, वहीं यह मटेरियल हाइड्रोजन इवोल्यूशन रिएक्शन में केवल 12 मिलीवोल्ट ओवरपोटेंशियल पर काम करता है। यह प्रदर्शन व्यावसायिक प्लैटिनम-कार्बन इलेक्ट्रोड से भी बेहतर पाया गया।

हाइड्रोजन को स्वच्छ ईंधन (Clean Fuel) माना जाता है क्योंकि इसके उपयोग से केवल पानी बनता है और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जित नहीं होती।

सूरज की रोशनी से खारे पानी का मीठा समाधान

इसी मटेरियल का दूसरा उपयोग समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने में सामने आया है। वैज्ञानिकों ने इसे सोलर ऊर्जा आधारित डीसैलिनेशन प्रक्रिया में इस्तेमाल किया। यह पारंपरिक तरीकों की तुलना में अधिक किफायती है। इस तकनीक में मटेरियल को एक विशेष 3-डी संरचना-जेनस इवैपोरेटर में लगाया गया। यह पानी की सतह पर तैरता है और केवल ऊपरी परत को गर्म करता है, जिससे ऊर्जा की बचत होती है।

प्रयोगों में इस सिस्टम ने लगभग 3.2 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर प्रति घंटे की वाष्पीकरण दर हासिल की। लगातार पांच दिनों तक खारे पानी में बिना नमक जमा हुए प्रभावी ढंग से काम किया। इससे प्राप्त पानी अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप पीने योग्य पाया गया।

MXene: ‘वंडर मटेरियल’ की नई क्षमता

यह नवाचार MXene नामक दो-आयामी (2D) मटेरियल पर आधारित है, जो अपनी उच्च विद्युत चालकता के लिए जाना जाता है। हालांकि सामान्य MXene में सक्रिय सतह क्षेत्र सीमित होता है, जिससे इसकी क्षमता प्रभावित होती है। इसे दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने इसे अल्ट्रा-थिन, रिबन जैसी संरचना में बदला और इसमें रुथेनियम (Ruthenium) परमाणुओं को जोड़ा।

इससे चार्ज ट्रांसपोर्ट बेहतर हुआ और सक्रिय सतह क्षेत्र बढ़ा, जिससे इसकी कैटेलिटिक (Catalytic) क्षमता में उल्लेखनीय सुधार हुआ।

स्थिरता और व्यावसायिक संभावना

अध्ययन में पाया गया कि यह मटेरियल लंबे समय तक स्थिर रहता है और सूरज की रोशनी में बेहतर प्रदर्शन करता है। इसकी फोटोथर्मल (Photothermal) क्षमता इसे और प्रभावी बनाती है। प्रो. पी.के. गिरि के अनुसार, यह तकनीक न केवल स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन बल्कि सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए भी व्यावसायिक रूप से उपयोगी साबित हो सकती है।

दोहरी चुनौती का एक समाधान

यह शोध ऐसे समय में सामने आया है जब एक ओर जीवाश्म ईंधन से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है, वहीं दूसरी ओर सुरक्षित पेयजल की कमी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। IIT गुवाहाटी का यह दोहरे उपयोग वाला सिस्टम भविष्य में परिवहन, उद्योग और ऊर्जा भंडारण के लिए स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराने के साथ-साथ जल संकट से निपटने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।

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