अर्घ्य विश्वास, लतागुड़ी।
डुआर्सः उत्तर बंगाल के डुआर्स क्षेत्र में बेंत शिल्प की एक लंंबी परंपरा रही है। पिछले पांच दशकों से अपने हाथों के हुनर से लतागुड़ी के कारीगर सुनील विश्वास ने इस परंपरा को जीवित रखा है। उनकी उम्र साठ साल पार कर चुकी है। उनके लिए उम्र केवल एक संख्या है, असली पहचान उनके काम के प्रति समर्पण है। साठ की उम्र पार करने के बाद भी उनके हाथों की सफाई और काम के प्रति लगन आज भी पहले जैसी ही है।
लतागुड़ी के महाकाल मोड़ के पास एक छोटे से घर में आज भी सुनील अपने काम में जुटे रहते हैं। घर के आंगन में बेंत के गट्ठर रखे रहते हैं और पास ही आग पर गर्म की गई लोहे की छड़ से बेंत को आकार दिया जाता है। इसी छोटे से कार्यस्थल पर बैठकर वे अपनी कला को नया रूप देते हैं। उनके मार्गदर्शन में लतागुड़ी के सौ से ज्यादा युवा इस इंडस्ट्री में ट्रेनिंग लेकर आत्मनिर्भर बन चुके हैं।
पहले बेंत वन विभाग से मिलता था। अस्सी के दशक में लतागुड़ी, गोयरकाटा, काठंबरी, नाथुआ या दलगांव के जंगलों से कई तरह के बेंत मिलते थे। उस बेंत से कुर्सियां, टेबल, झूले, फूलदान समेत कई तरह के फर्नीचर बनाए जाते थे।
सुनिल के जीवन की कहानी डुआर्स के बदलते समय की भी कहानी है। सत्तर के दशक की शुरुआत में लतागुड़ी का स्वरूप आज से बिल्कुल अलग था। उस समय यहां गिने-चुने लकड़ी के दोमंजिला घर थे और चारों ओर साल, सागौन, महोगनी और चिलौनी के घने जंगल फैले हुए थे। उन्हीं जंगलों में बेंत के घने झुरमुट हुआ करते थे, जिसने सुनील के जीवनयापन का रास्ता तय किया।
उन्होंने सबसे पहले स्टेशन मोड़ स्थित काली गांगुली की लकड़ी की दुकान में बेंत के काम की बारीकियां सीखनी शुरू की थीं। कुछ ही समय में उन्होंने कुर्सी, मोढ़ा और टेबल बनाने की तकनीक में महारत हासिल कर ली और फिर अपने दम पर बेंत के सामान बनाने का काम शुरू कर दिया।
पिछले चार दशकों में उनके बनाए फर्नीचर केवल लतागुड़ी या डुआर्स तक सीमित नहीं रहे, बल्कि अन्य जिलों और राज्यों तक भी पहुंचे हैं। हालांकि समय के साथ परिस्थितियां बदल गई हैं। अब डुआर्स के जंगलों में पहले जैसी बेंत की उपलब्धता नहीं रही। इसके कारण कारीगरों को काफी हद तक असम से आने वाले बेंत पर निर्भर रहना पड़ता है।
सुनिल विश्वास का मानना है कि आधुनिकता के दौर में लोग प्लास्टिक और अन्य वैकल्पिक सामग्रियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, लेकिन बेंत शिल्प की खूबसूरती और उपयोगिता कभी खत्म नहीं होगी। लतागुड़ी के पूर्व ग्राम पंचायत प्रधान जगबंधु सेन भी सुनील के योगदान को विशेष मानते हैं। उनके अनुसार, “सुनिल केवल एक कारीगर नहीं, बल्कि डुआर्स की बेंत कला के जीवित इतिहास हैं।”