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जब शहर सोता है तब हर रात बेजुबानों को खाना खिलाने निकलती है नंदिनी

हायर सेकेंडरी परीक्षा के बीच भी हर रात 8 किलो चावल और 2 किलो चिकन लेकर निकलती है नंदिनी।

By अभ्र बंद्योपाध्याय, Posted by: श्वेता सिंह

Feb 16, 2026 15:07 IST

कटवाः विद्यासागर पल्ली की रहने वाली नंदिनी इन दिनों हायर सेकेंडरी की परीक्षा दे रही हैं। जीवन के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर, जब ज्यादातर छात्र-छात्राएं पूरी तरह पढ़ाई में डूबे रहते हैं। ऐसे वक्त में भी नंदिनी की दिनचर्या में एक खास जिम्मेदारी शामिल है- गली के कुत्तों को हर रात खाना खिलाना।

नंदिनी को दो कुत्ते बहुत प्रिय हैं-लालू और कालू। हर रात वो नंदिनी के आने का इंतजार करते हैं। हर रात गली के कोने में जैसे ही उन्हें आहट मिलती है, वे तुरंत खड़े हो जाते हैं। उन्हें पता होता है कि नंदिनी आ रही है-अपने हाथों में चावल और मीट से भरी बड़ी बाल्टी लेकर।

नंदिनी बहुत प्यार से उनके सामने चावल फैलाती हैं। वे बड़े चाव से खाना खाते हैं। पेट भर जाने के बाद मानो उनकी आंखें कहती हों- “अगर तुम नहीं होतीं, तो यह कौन करता!”

परीक्षा और जिम्मेदारी साथ-साथ

हायर सेकेंडरी की परीक्षा चल रही है। पढ़ाई का दबाव है, लेकिन नंदिनी की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया। रात में अपनी पढ़ाई जल्दी खत्म करने के बाद घर के बाकी काम निपटाकर, वह अपने पिता के साथ घर से निकलती हैं।

बाल्टी में लगभग आठ किलो चावल और दो किलो चिकन मीट होता है। शहर की सड़कों पर जैसे ही वे निकलते हैं, कुत्तों का एक बड़ा समूह उनका इंतजार कर रहा होता है। हर रात करीब 90 से 100 कुत्तों को वह खाना खिलाती हैं।

नंदिनी कहती हैं, “अगर मैं एग्जाम के कारण नहीं आऊंगी, तो यह ठीक नहीं होगा। मैं रोज आती हूं। उन्हें इसकी आदत हो गई है। अगर मैं नहीं भी आऊंगी, तो बेचारे मेरा इंतजार करेंगे।”

बचपन का प्यार, अब जिम्मेदारी

नंदिनी को बचपन से ही कुत्तों और बिल्लियों से बहुत प्यार था। जैसे-जैसे वह बड़ी हुई, यह प्यार एक जिम्मेदारी में बदल गया। पिछले कुछ वर्षों से वह नियमित रूप से रात में गली के कुत्तों को खाना खिलाने निकल रही हैं।

वह बताती हैं, “मुझे यह ख्याल आया कि जिस तरह से मुझे खाने को मिलता है, वैसे ही उन्हें भी खाना मिलना चाहिए। इसीलिए मैंने उन्हें खाना खिलाने का फैसला किया।”

सिर्फ खाना खिलाना ही नहीं, बल्कि अगर कोई कुत्ता सड़क पर उल्टी कर दे या गंदगी कर दे, तो उसे भी वह साफ करती हैं। उनके लिए यह सेवा सिर्फ दया नहीं, बल्कि कर्तव्य है।

आलोचना के बीच सेवा

नंदिनी का यह काम सभी को पसंद नहीं आता। जब वह स्ट्रीट डॉग्स को खाना खिलाती हैं, तो कई लोग तरह-तरह की बातें कहते हैं। कई बार उन्हें भद्दी टिप्पणियां भी सुननी पड़ती हैं।

वह कहती हैं, “जब मैं स्ट्रीट डॉग्स को खाना खिलाते हुए देखती हूं, तो बहुत से लोग बहुत कुछ कहते हैं। इसलिए मैं यह काम रात में, लोगों की नजरों से छिपकर करती हूं। जब तक मुझसे हो सकेगा, मैं उन्हें खाना खिलाती रहूंगी।”

पिता का अटूट साथ

नंदिनी के पिता, मोहम्मद अजीज़ुर रहमान, एक ट्यूटर हैं। सीमित आय के बावजूद वह अपनी बेटी के इस नेक काम में पूरा साथ देते हैं। वह बताते हैं, “जब वह छोटी थी, तो उसे कुत्ते और बिल्लियां दिखाकर खाना खिलाना पड़ता था। तभी से उसके मन में उनके लिए प्यार बढ़ता गया। अब वह और भी ज्यादा बढ़ गया है।”

पहले केवल दो किलो चावल का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब जरूरत बढ़ने के साथ कुत्तों के लिए आठ किलो और बिल्लियों के लिए दो किलो चावल लेकर आते हैं।

अजीज़ुर रहमान कहते हैं, “मैं जितना हो सके उतना खर्च करता हूं। इसके अलावा, कई रिश्तेदार और उसके दोस्त भी मदद करते हैं। वह जो काम कर रही है, वह बहुत अच्छा काम है। जब तक मुझसे हो सकेगा, मैं उसके साथ रहूंगा।”

इंसानियत की मिसाल

परीक्षा की व्यस्तता, सामाजिक आलोचना और आर्थिक सीमाओं के बावजूद नंदिनी का सेवा भाव कम नहीं हुआ है। हर रात, जब शहर सोने की तैयारी में होता है तब नंदिनी और उनके पिता चुपचाप निकलते हैं-उन बेजुबानों के लिए, जो उनके आने का इंतजार करते हैं।

यह कहानी सिर्फ एक छात्रा की नहीं, बल्कि उस संवेदनशील सोच की है जो समाज को बेहतर बनाती है। नंदिनी ने साबित कर दिया है कि जिम्मेदारी और करुणा उम्र की मोहताज नहीं होती।

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