🔔 ताज़ा ख़बरें सबसे पहले!

Samachar EiSamay की ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, खेल, मनोरंजन और बिज़नेस अपडेट अब सीधे आपके पास।

नदी की लहरों में लिखा 71 सालों का संघर्ष: नाविक बिलाल पासवान की कहानी

बदलते परिवहन के बावजूद रोजाना नाव चलाना: बिलाल पासवान की दिनचर्या।

By नीलांंजन दास, Posted by: श्वेता सिंह

Feb 06, 2026 23:36 IST

रायगंज: समय के साथ कूलीक नदी का स्वरूप और महत्व बदल चुका है। एक समय था जब रायगंज से सुभाषगंज का सफर करने के लिए यही नदी सबसे प्रमुख मार्ग हुआ करती थी। नावें दिन-रात चलती थीं और इस जलमार्ग पर यात्रियों और माल की आवाजाही का सिलसिला जारी रहता था। अब कंक्रीट के पुल और बेहतर सड़क मार्गों के कारण इस नदी का महत्व कम हो गया है। बावजूद इसके एक नाव आज भी नदी में रोजमर्रा चलती है। उस नाव की कमान संभालते हैं 71 वर्षीय बिलाल पासवान। उनके लिये यह केवल पेशा नहीं है बल्कि यह काम ही उनका जुनून बन चुका है।

बिलाल पासवान पिछले 60 वर्षों से कूलीक नदी में नाव चला रहे हैं। रायगंज शहर के पुराने घाट पर वह रोज सुबह अपनी नाव लेकर आते हैं और नदी के दोनों किनारों पर यात्रियों को पार कराते हैं।

पेशा या जुनून: 60 साल की निष्ठा

बिलाल पासवान बताते हैं कि पहले नदी बहुत बड़ी हुआ करती थी और लोग इसी जलमार्ग से सुभाषगंज आते-जाते थे। उस समय नावों और नाविकों की संख्या भी काफी ज्यादा थी।

लेकिन 2001-2002 में कंक्रीट का पुल बनने के बाद यह जलमार्ग धीरे-धीरे महत्व खोने लगा। अधिकतर नाविकों ने अपना पेशा छोड़ दिया, लेकिन बिलाल पासवान ने अपनी पुरानी नाव थामे रखी।

वह कहते हैं, "नदी अब छोटी हो गई है और लोग इसका इस्तेमाल कम करते हैं। इस काम के प्रति मेरा अब भी उतना ही लगाव है, इसका नशा है। मैंने इसी पेशे से अपना परिवार चलाया है। बच्चों को बड़ा किया और जब तक जिंदा रहूंगा, मैं यही काम करता रहूंगा।"

उनके लिए यह पेशा केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बन गया है। यह उनके पुराने जमाने की यादों और अपनी पहचान का प्रतीक है।

दिनभर की मेहनत

बिलाल पासवान रोज सुबह पांच बजे नावघाट पर पहुंच जाते हैं। ठंडी हवाओं और हल्की धुंध में भी वह अपनी नाव को तैयार करते हैं और दिनभर यात्रियों को पार कराते हैं।

उनका काम मुख्य रूप से उन स्थानीय लोगों के लिए है, जो अब भी इस जलमार्ग का उपयोग करते हैं। नौ साल पहले उनकी पत्नी रामप्यारी का निधन हो गया। वह आज भी उसी निष्ठा और जोश के साथ काम कर रहे हैं।

उनके तीन बेटे अब परिवार की आर्थिक मदद करते हैं, लेकिन इसके बावजूद वह नाव चलाना नहीं छोड़ते। उनके लिए यह पेशा सिर्फ कमाई का साधन नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली और पहचान का हिस्सा बन चुका है।

रोजमर्रा की कमाई और चुनौतियां

बिलाल पासवान यात्रियों से नाव पार करने के लिए पांच रुपये लेते हैं, जबकि मोटरसाइकिल से पार करने पर 10 रुपये किराया लेते हैं। दिनभर लगभग 70-80 लोग उनकी नाव में सवारी करते हैं। इससे उन्हें 200 से 400 रुपये तक की कमाई होती है।

त्योहारों और खास दिनों में यात्रियों की संख्या बढ़ जाती है। उनकी कमाई भी कुछ अधिक हो जाती है। हालांकि अब यात्रियों की संख्या पहले जितनी नहीं रही। इसके बावजूद, वह कहते हैं कि जब तक जिंदा रहेंगे, यह काम जारी रहेगा। बिलाल पासवान कहते हैं, "पैसा कमाने के लिए नहीं, बल्कि नदी के साथ जुड़ी अपनी जिंदगी को जीने के लिए मैं नाव चलाता हूं। यह मेरी पहचान और जुनून है।"

यात्रियों की पसंद और भरोसा

कमला घोष, जो अक्सर कूलीक नदी पार करती हैं। उन्होंने बताया, "मुझे रायगंज शहर आना होता है। टोटो से जाने पर 30 रुपये लगते हैं, लेकिन नाव से केवल 10 रुपये में पार हो जाती हैं। जब तक बिलाल भाई हैं, मैं नाव से ही जाऊंगी।" यात्रियों की पसंद और विश्वास इस बात का प्रमाण है कि पुराने पेशों और पारंपरिक तरीकों की अपनी एक अलग अहमियत होती है।

समाजसेवकों की दृष्टि

स्थानीय समाजसेवी रूपेश साहा कहते हैं,"आज परिवहन के साधन बदल गए हैं। केवल कुछ लोग ही अब इस जलमार्ग का इस्तेमाल करते हैं। शायद बिलाल ही घाट के अंतिम नाविक होंगे।" यह बताता है कि बिलाल जैसे लोग न केवल पेशेवर रूप से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी इस क्षेत्र की धरोहर हैं।

पुरानी यादें और अडिग लगाव

जहां आधुनिकता ने परिवहन के नए साधनों को प्राथमिकता दी है। वहीं बिलाल पासवान पुराने रास्तों और पेशों की यादों को जीवित रखे हुए हैं। उनकी जिंदगी नदी की लहरों की तरह संघर्ष, निष्ठा और लगाव से भरी हुई है।

बिलाल की कहानी केवल एक नाविक की नहीं है, बल्कि समय के साथ बदलती दुनिया में जिंदा रहने और अपने पेशे से प्यार करने वाले एक आम इंसान की प्रेरणादायक कहानी है।

Prev Article
विद्यासागर के आदर्शों के साथ सेवानिवृत्ति, सुतपा बेरा ने रची मिसाल

Articles you may like: