हैदराबाद: नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने सोशल मीडिया के प्रभावों पर अपने विचार साझा करते हुए इसे नियंत्रित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। सत्यार्थी का कहना है कि सोशल मीडिया बच्चों और युवाओं के लिए संवेदनशील और जोखिम भरा हो सकता है। इसकी वजह यह कि सोशल मीडिया नफरत, हिंसा और फेक न्यूज फैलाने का जरिया बन गया है।
सत्यार्थी ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बंद किया, जबकि भारत में सरकार ने बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अध्ययन समिति बनाई है। सत्यार्थी ने इस कदम का स्वागत करते हुए बताया कि इंटरनेट प्रदाताओं और प्लेटफॉर्म्स को जिम्मेदार ठहराना जरूरी है ताकि बाल शोषण और ट्रैफिकिंग जैसी घटनाओं को रोका जा सके।
विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया नियमन केवल प्रतिबंध नहीं बल्कि सुरक्षा और शिक्षा के लिए एक सक्रिय पहल हो सकता है। सत्यार्थी ने कहा कि हम सोशल मीडिया को केवल नकारात्मक दृष्टि से न देखें। इसे नैतिक मूल्यों और समुदाय निर्माण के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
सत्यार्थी ने हाल ही में अपनी पुस्तक 'करुणा: द पावर ऑफ कम्पैशन' का विमोचन किया। पुस्तक में उन्होंने सहानुभूति को मुल्यांकन योग्य शक्ति बताते हुए इसे समाज परिवर्तन और नैतिक शिक्षा का आधार बताया। उन्होंने इस वर्ष CQ मापने का नया उपकरण लॉन्च करने का भी ऐलान किया, जिससे व्यक्तिगत और सामूहिक सहानुभूति को मापा जा सके।
विश्लेषकों के अनुसार, सत्यार्थी का यह दृष्टिकोण न केवल बच्चों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जिम्मेदार इस्तेमाल को बढ़ावा देने और सामाजिक संवेदनशीलता को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक पहल है।
सोशल मीडिया नियमन पर इस तरह के कदम भविष्य में डिजिटल दुनिया को सुरक्षित और जिम्मेदार बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।