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‘मुझे पास अटल प्रमाण है...’, आयोग की प्रणाली में बड़ी ‘त्रुटि’ उजागर करते हुए अभिषेक का सनसनीखेज आरोप

सदन में तृणमूल सांसद ने समझाया कि आयोग के पोर्टल पर काम के दौरान वोटरों के नाम कैसे गायब हो रहे हैं ?

By एलिना दत्त, Posted by: लखन भारती

Feb 03, 2026 22:03 IST

नई दिल्ली/कोलकाताः नोटबंदी और लॉकडाउन की तरह ही बिना योजना के SIR हो रहा है। बंगाल की मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए आयोग नए-नए नियम बना रहा है। मंगलवार को दिल्ली के चाणक्यपुर की बंगभवन से उदाहरण पेश करते हुए तृणमूल के अखिल भारतीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने हमला बोला। उनका आरोप है कि माइक्रो ऑब्जर्वरों का इस्तेमाल करके मनमानी से नाम हटाए जा रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने आयोग की प्रणाली की भी 'गलतियाँ' उजागर कीं और दावा किया कि इसके अचूक प्रमाण भी उनके पास हैं।

इस दिन पत्रकार सम्मेलन में अभिषेक ने स्पष्ट रूप से फिर कहा कि बंगाल की सरकार या तृणमूल कांग्रेस SIR के खिलाफ नहीं हैं लेकिन जिस तरह वर्तमान में बिना किसी योजना के मतदाता सूची में विशेष सघन संशोधन का काम चल रहा है, वह स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा, 'हम SIR के खिलाफ नहीं हैं। हम इस अकल्पनीय तरीके से SIR के खिलाफ हैं। अगर इसे करना ही था तो इसे 2024 के जून से क्यों नहीं शुरू किया ? तब तो कोई चुनाव भी नहीं था! समय लेकर ऐप बनाया जा सकता था और यह काम किया जा सकता था लेकिन नोटिफिकेशन 25 सितंबर को आया। फॉर्म बाद में दिया गया।'

यहीं खत्म नहीं है अभिषेक के मुताबिक, बंगाल में टारगेट करके नाम हटाने का काम चल रहा है। उनका कहना है, 'बंगाल में जो नियम है, वह अन्य 11 जगहों पर जहां SIR चल रहा है, वहां नहीं है। बंगाल के लिए विशेष रूप से सैकड़ों माइक्रो ऑब्ज़र्वर नियुक्त किए गए हैं। SIR नोटिफ़िकेशन में स्पष्ट लिखा था, ERO ही अंतिम प्राधिकरण है। तो माइक्रो ऑब्ज़र्वर कहां से आ गए! ये कहते हैं कि ये ERO का काम देखेंगे। अब ERO को बिठाकर माइक्रो ऑब्ज़र्वर बैकएंड में लॉग इन कर रहे हैं। अपनी इच्छा अनुसार काम कर रहे हैं। मामले को खारिज कर रहे हैं।’

इसके बाद ही अभिषेक ने आयोग के सिस्टम में एक खामी को पकड़ते हुए समझाया कि कैसे मतदाता का नाम हटा दिया जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘अगर पत्रकार खोजें तो देखेंगे कि माइक्रो ऑब्जर्वर ऑब्जर्वेशन और रोल ऑब्जर्वर ऑब्जर्वेशन के लिए पोर्टल पर अलग कॉलम है। अब अगर इनकी ऑब्जर्वेशन अलग है, मतलब ERO की ऑब्जर्वेशन से अगर मेल नहीं खाती, तो ERO के पास एक अलग पेज खुल जाता है। वहां फिर दो विकल्प आते हैं। एक—मैं माइक्रो ऑब्जर्वर के साथ सहमत हूँ और दूसरा—मैं माइक्रो ऑब्जर्वर के साथ सहमत नहीं हूँ। अब अगर कोई माइक्रो ऑब्जर्वर के साथ सहमत नहीं वाले विकल्प के चेकबॉक्स पर क्लिक करता है तो मामला बंद हो जाता है लेकिन अगर कोई गलती से दूसरे बॉक्स पर क्लिक कर देता है, तो उस मतदाता का नाम अपने आप डिलीट हो जाता है। मेरे पास इसका प्रमाण है।’

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सुर में ही तृणमूल सांसद ने आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करने का भी आरोप लगाया। उनका आरोप है, 'अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि अनमैप्ड और लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी की सूची अलग-अलग प्रकाशित करनी होगी लेकिन आयोग ने अब इसका नाम ही बदलकर डिस्क्रिपेंसी मैप कर दिया है लेकिन यह केवल ERO पोर्टल पर अपलोड हुआ है। सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया।' आयोग के खिलाफ तृणमूल लगातार सुर ऊँचा कर रहा है।

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