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'संविधान नहीं मान सकते तो भारत छोड़ दें': व्हाट्सऐप और मेटा की प्राइवेसी पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार

डेटा शेयरिंग के नाम पर नागरिकों के निजता अधिकार से समझौता बर्दाश्त नहीं

By डॉ. अभिज्ञात

Feb 03, 2026 14:36 IST

नयी दिल्लीः नई दिल्ली में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने WhatsApp और Meta पर कड़ा रुख अपनाया और कहा कि ये कंपनियां लोगों का डेटा जिस तरह साझा कर रही हैं, वह गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने यहां तक कह दिया कि अगर कंपनियां संविधान का पालन नहीं कर सकतींतो उन्हें देश छोड़ देना चाहिए। दरअसल, अदालत उस जुर्माने से जुड़ी अपीलों की सुनवाई कर रही थी, जो भारत के प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने WhatsApp की 2021 की “ले लो या छोड़ दो” (take it or leave it) वाली प्राइवेसी नीति को लेकर Meta पर लगाया था। CCI का कहना था कि यूज़र को मजबूरी में यह नीति माननी पड़ती है, इसलिए Meta पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया।

इसके बाद नवंबर 2025 में NCLAT ने जुर्माना तो सही माना, लेकिन विज्ञापन के लिए सीमित डेटा साझा करने की इजाजत दे दी। फिर दिसंबर में यह साफ किया गया कि चाहे विज्ञापन से जुड़ा डेटा हो या कोई और, हर स्थिति में यूज़र को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह चाहे तो डेटा साझा करने से बाहर निकल सके।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाली पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि निजता के अधिकार से कोई समझौता नहीं किया जा सकता और अदालत एक भी जानकारी साझा करने की खुली छूट नहीं देगी। जजों ने सवाल उठाया कि जब यूज़र के सामने विकल्प ही न हो और उसे मजबूरी में शर्तें माननी पड़ें तो ऐसी सहमति को सही कैसे कहा जा सकता है। अदालत ने इसे “गढ़ी हुई सहमति” बताया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऑप्ट-आउट जैसी व्यवस्था कागजों में तो ठीक लगती है, लेकिन हकीकत में आम आदमी, खासकर दूरदराज़ इलाकों में रहने वाला व्यक्ति, इतनी जटिल और चालाक भाषा में लिखी प्राइवेसी पॉलिसी समझ ही नहीं पाता। ऐसे में उपभोक्ताओं का व्यावसायिक फायदा उठाया जा रहा है और जो लोग आवाज़ नहीं उठा पाते, वे इस सिस्टम के शिकार बन जाते हैं।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि लोग इन प्लेटफॉर्म्स के इतने आदी हो चुके हैं कि उनके पास असल में कोई विकल्प नहीं बचता। या तो शर्तें मानो या सेवा छोड़ दो। इसलिए असली मुद्दा चेतावनी का नहीं, बल्कि मजबूरी का है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि किसी भी हाल में नागरिकों के निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं होने दिया जाएगा और इसे देश की निजता पर “शालीन तरीके से की गई चोरी” बताया।

अब इस मामले में अंतरिम आदेश देने के लिए अगली सुनवाई 9 फरवरी को होगी। साथ ही केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाया गया है और उसे जवाब दाखिल करने की अनुमति दी गई है।

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